मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने कहा कि भारत में न्यायपालिका को संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह बनाए रखने में नागरिक समाज, महिला आंदोलनों और आम नागरिकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने कहा कि देश की लोकतांत्रिक शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत जनता का संवाद है, जो हमेशा न्याय की दिशा तय करता आया है।
सीजेआई गवई 30वें जस्टिस सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों में भारत ने महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने और एक समावेशी समाज बनाने की दिशा में असाधारण यात्रा तय की है। अदालतों ने इस सफर में बराबरी और मानवीय गरिमा के संरक्षक के रूप में भूमिका निभाई है।
चुनौतियां और न्यायिक व्याख्याएं
जस्टिस गवई ने स्वीकार किया कि यह यात्रा चुनौतियों से भरी रही है। कई बार अदालतें महिलाओं की वास्तविक परिस्थितियों को समझने में विफल रहीं या संविधान की परिवर्तनकारी भावना के अनुरूप न्याय नहीं दे पाईं। ऐसे समय में नागरिक समाज और महिला आंदोलनों ने न्यायपालिका को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।
नागरिक समाज की भूमिका
सीजेआई ने कहा कि लैंगिक न्याय में प्रगति केवल अदालतों की उपलब्धि नहीं है। नागरिक समाज और महिला आंदोलनों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रतिगामी फैसलों पर सवाल उठें, बहस हो और अंततः उन्हें संवैधानिक दायरे में सुधार या पुनर्व्याख्या के माध्यम से लाया जाए।
जनता और न्यायपालिका के संवाद की अहमियत
उन्होंने कहा कि अदालतों और जनता के बीच संवाद ही भारत की लोकतांत्रिक ताकत का मूल आधार है। सीजेआई के अनुसार, लैंगिक समानता कोई अंतिम लक्ष्य नहीं बल्कि एक निरंतर जारी प्रक्रिया है, जिसे हर पीढ़ी को नई प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाना होगा।

