कलकत्ता हाईकोर्ट ने विवाह का झूठा वादा कर महिला से दुष्कर्म करने के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की अपील याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि शुरुआत से ही शादी न करने की मंशा के साथ महिला की सहमति ली गई हो, तो ऐसी सहमति को कानूनन सहमति नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को अपने गंभीर अपराध का परिणाम भुगतना ही होगा।
यह मामला मुर्शिदाबाद जिले का है, जहां कंदी सत्र अदालत ने वर्ष 2014 में आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी के खिलाफ एक जनवरी 2006 को शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत में महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपी की मंशा शुरू से ही गलत थी। एक गरीब युवती आरोपी के बहकावे में आ गई और उसकी वासना का शिकार बनी। आरोपी ने महिला से यह कहकर संबंध बनाए थे कि यदि वह उसे बच्चा देगी तो वह उससे विवाह करेगा। लेकिन जब पीड़िता विवाह के लिए अपने परिवार के साथ आरोपी के पास पहुंची, तो उसने शादी से इनकार कर दिया। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी उस समय पहले से ही एक अन्य महिला से शादीशुदा था। उस समय पीड़िता आरोपी के बच्चे की गर्भवती भी थी, जिसके बाद बुरवान थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
अपील पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) ने कहा कि जिस सहमति को शुरू से ही वादा पूरा न करने की नीयत से प्राप्त किया गया हो और लड़की को शादी का झूठा भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाए गए हों, वह सहमति नहीं मानी जा सकती। यह पूरी तरह गलतफहमी में दी गई सहमति है। अदालत ने कहा कि आरोपी की मंशा आरंभ से ही गलत थी, इसलिए उसे अपने कृत्य का परिणाम भुगतना होगा।
दोषी के वकील ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ता 20–21 वर्ष की बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से संबंध बनाए थे, इसलिए इसे दुष्कर्म नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि महिला को आरोपी के शादीशुदा होने की जानकारी थी। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी कभी भी पीड़िता से विवाह करना नहीं चाहता था और उसने केवल अपनी वासना पूरी करने के लिए शादी का झूठा वादा किया था। अदालत ने अभियोजन की दलीलों से सहमति जताते हुए अपील याचिका खारिज कर दी।

