अहमदाबाद, 4 अप्रैल 2026
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ ने न्यायपालिका में सुधार और आधुनिकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा है कि एक जीवंत लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था को समाज की बदलती जरूरतों और नागरिकों की अपेक्षाओं के अनुसार निरंतर विकसित होना चाहिए। वे गुजरात के जिला न्यायपालिका के जजों के दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे, जिसका विषय ‘न्याय व्यवस्था को नया रूप देना-रूढ़ियों से परे जाना’ रखा गया था।
जस्टिस नाथ के संबोधन के मुख्य बिंदु:
1. सुलभता और तकनीक पर जोर
जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका केवल निर्णय देने वाली संस्था नहीं है, बल्कि अधिकारों की रक्षक है। उन्होंने कहा:
- डिजिटल उपकरणों की भूमिका: न्याय प्रक्रिया को सुलभ, कुशल और जवाबदेह बनाने के लिए आधुनिक तकनीक और डिजिटल उपकरणों का उपयोग अनिवार्य है।
- संस्थागत वैधता: न्यायपालिका की साख केवल सटीक निर्णयों पर नहीं, बल्कि इस बात पर टिकी है कि वह आम जनता के लिए कितनी सुलभ और पारदर्शी है।
2. ‘जीवन के विद्यार्थी’ बनें जज
जजों की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश का कार्य केवल कोर्ट रूम की चारदीवारी तक सीमित नहीं है।
- पूर्वाग्रहों से मुक्ति: निष्पक्ष न्याय के लिए जरूरी है कि जज पुरानी और रूढ़िवादी धारणाओं को छोड़कर हर मामले को एक नए और निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखें।
- निरंतर सीखना: उन्होंने जजों को ‘जीवन का विद्यार्थी’ बनने की सलाह दी, जो समाज की व्यापक धाराओं और बदलती वास्तविकताओं से लगातार जुड़ा रहे।
3. मूलभूत सिद्धांतों की मजबूती
जस्टिस नाथ ने विश्वास दिलाया कि न्याय व्यवस्था को ‘नया रूप’ देने का अर्थ अपने मूल सिद्धांतों से भटकना नहीं है। इसके विपरीत, समकालीन चुनौतियों के अनुरूप ढलना इन सिद्धांतों को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा और शासन में जनता के विश्वास को गहरा करेगा।

