पणजी/नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गोवा के बहुचर्चित कथित गैर-कानूनी आयरन ओर माइनिंग (Illegal Iron Ore Mining Case) मामले में अब तक की सबसे बड़ी विधिक कार्रवाई की है। एजेंसी ने ‘प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट’ (PMLA) के तहत एक प्रोविज़नल अटैचमेंट ऑर्डर जारी करते हुए ₹1,023.85 करोड़ से अधिक की चल-अचल संपत्तियों को कुर्क (Attach) कर लिया है।
ED के अनुसार, यह कड़ी विधिक कार्रवाई गोवा के रसूखदार सलगांवकर ग्रुप (Salgaocar Group) और उससे जुड़े AVS ग्रुप पर बड़े पैमाने पर अवैध आयरन ओर खनन और उससे अर्जित किए गए काले धन को सफेद करने (Money Laundering) के मामले में की गई है। इस कार्रवाई की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब्त की गई संपत्तियां न केवल भारत बल्कि सिंगापुर में भी फैली हुई हैं।
भारत और सिंगापुर में फैली हजार करोड़ की संपत्तियों का विवरण
ED द्वारा कुर्क की गई अरबों रुपये की संपत्तियों का विधिक और वित्तीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
| संपत्ति का प्रकार | स्थान / विवरण | विधिक मूल्य (करोड़ रुपये में) |
| 99 अचल संपत्तियां | भारत (विभिन्न राज्य) | ₹459.10 करोड़ |
| 31 अचल संपत्तियां | सिंगापुर (Offshore Real Estate) | ₹471.32 करोड़ |
| इक्विटी शेयर्स | भारतीय कंपनियों में हिस्सेदारी | ₹93.42 करोड़ |
| कुल संचयी मूल्य | समग्र रूप से ज़ब्त संपत्ति | ₹1,023.85 करोड़ |
ये संपत्तियां मुख्य रूप से स्वर्गीय अनिल सलगांवकर की एस्टेट (उनकी एडमिनिस्ट्रेटर लक्ष्मी अनिल सलगांवकर के माध्यम से), सलगांवकर माइनिंग इंडस्ट्रीज़, शांतिलाल खुशालदास एंड ब्रदर्स, एस. कांतिलाल एंड कंपनी, सालिथो ओर्स, वर्टेक्स न्यूटन प्रोजेक्ट्स और सुवर्णरेखा पोर्ट के विधिक स्वामित्व के तहत दर्ज थीं।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश बना जांच का विधिक आधार\
मनी लॉन्ड्रिंग की यह व्यापक जांच मूल रूप से गोवा पुलिस की सीआईडी (CID) द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकियों (FIRs) के आधार पर शुरू हुई थी।
- शीर्ष अदालत का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने 2014 और 2018 के अपने ऐतिहासिक फैसलों में विधिक रूप से यह माना था कि 22 नवंबर 2007 के बाद (जब तक कि नए माइनिंग लीज़ जारी नहीं किए गए) गोवा राज्य में की गई संपूर्ण माइनिंग पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक थी।
- अवैध उत्खनन का गणित: ED की वित्तीय जांच में सामने आया कि AVS ग्रुप ने साल 2007 से 2012 के दौरान नियमों को ताक पर रखकर 10 माइनिंग लीज़ का अवैध रूप से संचालन किया। इस अवधि में आयरन ओर की गैर-कानूनी खुदाई, घरेलू बिक्री और अंतरराष्ट्रीय निर्यात के जरिए ₹2,492.95 करोड़ की प्रत्यक्ष अवैध कमाई की गई।
शेल कंपनियों का मकड़जाल: ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स से चीन तक पहुंचे तार
ED की फॉरेंसिक ऑडिट और तकनीकी जांच में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग के एक बहुत बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ है:
- अंडर-इनवॉइसिंग का खेल: गोवा की खदानों से ‘गैर-कानूनी’ तरीके से निकाले गए कीमती आयरन ओर को कागजों पर ‘बहुत ही कम कीमत’ (Under-Invoicing) दिखाकर टैक्स चोरी की गई।
- कागजी मध्यस्थ: इस ओर को ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स (BVI) में स्थापित की गई शेल कंपनियों (Special Purpose Vehicles – SPVs) को निर्यात किया गया। ये विदेशी शेल कंपनियां केवल कागजी मध्यस्थ के रूप में काम कर रही थीं।
- चीन को पुनर्विक्रय (Resale): इन शेल कंपनियों ने उसी आयरन ओर को वास्तविक वैश्विक बाजार मूल्य पर चीन को दोबारा बेच दिया। इस चालाकी भरे अंतरराष्ट्रीय ऑफशोर व्यापारिक मुनाफे (Offshore Trading Profit) से ₹2,744.89 करोड़ की अतिरिक्त काली कमाई की गई, जिसे भारतीय टैक्स अथॉरिटीज से पूरी तरह छिपाया गया।
कुल ₹5,237 करोड़ की ‘अपराध आय’ (Proceeds of Crime)
केंद्रीय जांच एजेंसी ने इस पूरे घोटाले से हुई कुल अपराध की आय (Proceeds of Crime) का विधिक आकलन ₹5,237.84 करोड़ किया है। ED का आधिकारिक आरोप है कि इस भारी-भरकम अवैध फंड को BVI और सिंगापुर में मौजूद एसपीवी (SPV) के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणालियों में घुमाया गया (Layering)।
इसके बाद इस पैसे का इस्तेमाल विदेशों में आलीशान चल और अचल संपत्तियां खरीदने के लिए किया गया, और बाद में मनी लॉन्ड्रिंग के अंतिम चरण (Integration) के रूप में इसका कुछ हिस्सा ‘विदेशी प्रत्यक्ष निवेश’ या शेयर कैपिटल के रूप में वापस भारत लाकर वैध कंपनियों में लगा दिया गया। ED इस मामले में शामिल अन्य आरोपियों और वित्तीय कड़ियों पर विधिक शिकंजा कसने के लिए अपनी जांच का दायरा बढ़ा रही है।

