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Sunday, July 26, 2026

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संपादकीय -“हुज़ूर… आते-आते बहुत देर कर दी!”

जब सत्ता झुकती है, तो वह जनता की ताकत के सामने झुकती है, अहंकार के सामने नहीं।

लेखक:
रवि जी. निगम
राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय श्रमिक पार्टी
संपादक – मानवाधिकार अभिव्यक्ति न्यूज़

लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संसद की ऊँची इमारतें नहीं, बल्कि सड़क पर खड़ा वह नागरिक होता है जो अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक आवाज़ उठाता है। जब विद्यार्थी अपने भविष्य की रक्षा के लिए घरों से निकलते हैं, तब वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं।

शिक्षा व्यवस्था में लगातार सामने आए गंभीर विवादों के बाद छात्रों ने तीन स्पष्ट माँगें रखीं। उनका कहना था कि जवाबदेही तय हो, पीड़ित परिवारों के साथ न्याय हो और उन्हे 1 करोड़ का मुआबजा दिया जाये इतना ही नहीं 20 जुलाई संसद मार्च के व आंदोलन के दौरान देश भर में छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएँ। इन माँगों को लेकर छात्रों ने लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया।

लेकिन प्रश्न यह है कि यदि अंततः सरकार को इन माँगों पर सहमत होना ही था, तो फिर इतना लंबा इंतज़ार क्यों कराया गया?

हुज़ूर… आते-आते बहुत देर कर दी।

यदि यह निर्णय पहले लिया जाता, तो क्या देशभर में फैला आक्रोश टल नहीं सकता था? क्या हजारों विद्यार्थियों को सड़कों पर उतरने की आवश्यकता पड़ती? क्या देश की शिक्षा व्यवस्था पर इतना गहरा अविश्वास पैदा होता?

लोकतंत्र में संवाद पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, टकराव नहीं। किंतु जब संवाद की जगह मौन और संवेदनशीलता की जगह कठोरता दिखाई देती है, तब परिस्थितियाँ अनावश्यक रूप से गंभीर हो जाती हैं।

20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर सोशल मीडिया और विभिन्न समाचार माध्यमों पर अनेक वीडियो सामने आए। इन वीडियो में कुछ स्थानों पर छात्रों के साथ बल प्रयोग तथा कुछ छात्राओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और अनुचित व्यवहार के आरोप भी व्यापक रूप से चर्चा में रहे। यदि इन आरोपों में सत्यता पाई जाती है, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न है।

एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार होना चाहिए। किसी भी छात्र या छात्रा की गरिमा से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मैं, (रवि जी. निगम, राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय श्रमिक पार्टी), केंद्र एवं संबंधित प्रशासन से मांग करता हूँ कि संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़े सभी आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग, अनावश्यक बल प्रयोग या महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध कोई कृत्य किया गया है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लोकतंत्र में वर्दी का सम्मान तभी सुरक्षित रहता है जब उसके साथ जवाबदेही भी जुड़ी हो।

आज सरकार ने अंततः शिक्षा मंत्री – धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा स्वीकार किया और छात्रों की प्रमुख माँगों पर निर्णय लिया। क्योंकि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को सुनना सरकार का दायित्व है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह निर्णय तब आया, जब लंबे समय तक विरोध, असंतोष और दबाव के बाद सरकार के पास विकल्प सीमित होते गए। यदि शुरुआत में ही संवेदनशीलता दिखाई जाती, तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

सरकारें केवल निर्णय लेने से नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने से विश्वास अर्जित करती हैं।

यह आंदोलन केवल तीन माँगों की जीत नहीं है। यह उन लाखों युवाओं की जीत है जिन्होंने यह विश्वास बनाए रखा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण संघर्ष परिवर्तन ला सकता है।

अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था को राजनीति से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय दायित्व के रूप में देखा जाए। परीक्षाएँ निष्पक्ष हों, जवाबदेही स्पष्ट हो, और ऐसा वातावरण बने जहाँ किसी विद्यार्थी को अपने भविष्य के लिए सड़कों पर उतरने की मजबूरी न हो।

अंत में उन सभी छात्र-छात्राओं को मेरा नमन, जिन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहकर अपने अधिकारों की आवाज़ बुलंद की।

और सरकार से केवल एक बात—

“हुज़ूर… आते-आते बहुत देर कर दी।”

क्योंकि समय पर लिया गया न्यायपूर्ण निर्णय नेतृत्व कहलाता है, और देर से लिया गया निर्णय केवल परिस्थितियों की स्वीकृति।

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