सिवसागर और चराइदेव में तबाही की वजह तलाशेगी केंद्रीय एजेंसी, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कैबिनेट में लिए बड़े फैसले
गुवाहाटी: असम सरकार ने राज्य के सिवसागर और चराइदेव जिलों में इस वर्ष आई विनाशकारी बाढ़ के मूल कारणों का पता लगाने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से उच्चस्तरीय जांच कराने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में इस प्रस्ताव को औपचारिक स्वीकृति दे दी गई है और इसके लिए असम सरकार जल्द ही केंद्र सरकार से औपचारिक अनुरोध करेगी। इसके साथ ही सरकार ने बहुविवाह प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए कड़ा प्रशासनिक रुख अख्तियार किया है।
कैबिनेट बैठक के उपरांत मंगलवार को आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने इन नीतिगत निर्णयों की विस्तृत जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि दोनों संवेदनशील जिलों में आई अप्रत्याशित बाढ़ के पीछे किसी प्रकार की मानवीय चूक, लापरवाही या साजिश की संभावनाओं की निष्पक्ष पड़ताल आवश्यक है। इसके लिए राज्य सरकार अगले 10 दिनों के भीतर गृह मंत्रालय और केंद्र सरकार को औपचारिक पत्र भेजेगी, ताकि मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जा सके।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि हालांकि किसी राज्य में सीबीआई जांच की संस्तुति पर अंतिम निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार केंद्र सरकार के पास सुरक्षित होता है, लेकिन राज्य सरकार अपने स्तर पर सभी आवश्यक साक्ष्य और सिफारिशें केंद्र के समक्ष प्रस्तुत करेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि केंद्रीय जांच एजेंसी के हस्तक्षेप से बाढ़ प्रबंधन तंत्र में किसी भी स्तर पर हुई वित्तीय या संरचनात्मक अनियमितता की सच्चाई जनता के सामने आ सकेगी।
प्रशासनिक सुधारों को लेकर मुख्यमंत्री ने एक और बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि बहुविवाह करने वाले राज्य सरकार के किसी भी कर्मचारी को सेवा में बने रहने का अधिकार नहीं होगा। उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी एक से अधिक विवाह करता पाया जाता है, तो उसे तत्काल प्रभाव से सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया जाएगा। सरकार इस दिशा में सेवा नियमावली को और अधिक कठोर बनाने जा रही है।
डॉ. सरमा ने रेखांकित किया कि यह अनुशासनात्मक नियम किसी धर्म विशेष के आधार पर नहीं, बल्कि राज्य के सभी सरकारी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होगा। उन्होंने दोहराया कि सार्वजनिक सेवा में शुचिता, अनुशासन और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है और किसी भी कर्मचारी को सामाजिक या धार्मिक आधार पर इस कानून से छूट नहीं दी जाएगी।

