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Saturday, October 16, 2021

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SC का संज्ञान लेना जरूरी – गणतंत्र दिवस पर जो हुआ क्या वाकई वो किसानों द्वारा किया गया ? क्या ये आंदोलन को ध्वस्त करने की साजिश ? आखिर कौन जवाबदेह ? सरकार या अन्नदाता ? रवि जी. निगम

गणतंत्र या गनतंत्र ? क्षेत्रीय जनता या हिंदू सभा ?

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नई दिल्ली: नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों के एक समूह के रूप में कुुुुुछ कथित अराजकतत्वो ने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में काफी उत्पात मचाया और हिंसा की। लेकिन उसकी जद में अब वो अन्नदाता आ गये जो 62 दिनों से अपने अधिकार के लिये आंदोलन कर रहा था, जबकि असल आरोपी ‘दीप सिद्धू’ अभी तक फरार है, जिसने लाल किले को लहूलुहान किया, जिसकी नजदीकी भाजपा और देश के प्रधान मंत्री और सरकार के दिग्गज व्यक्तियों के साथ है, जो कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन चल रहा था उसमें किसान नेताओं का दावा है कि वो उनके आन्दोलन का हिस्सा नहीं है।

जिसके बाद केंद्र सरकार उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। केंद्र सरकार और पुलिस के एक्शन के डर से किसान बुधवार सारी रात नहीं सो पाए। वहीं पर भी पुलिस देर रात तक गश्त करती रही। बॉर्डर पर डटे किसानों ने भी रात भर जाग कर काटी।

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क्या गणतंत्र इसी को कहते हैं ?

सवाल अब ये उठता है कि क्या जो आरोप किसान नेता लगा रहे हैं क्या उसमें सच्चाई है ? क्या वाकई में आंदोलन ध्वस्त करने के लिये सरकार ने ये साजिश रची, यदि नहीं तो जो पुलिस ट्रैक्टर रैली को कानूनी तौर पर अनुमति न दी जाये जिसके लिये सरकार की ओर से भी प्रयास किये गये लेकिन हमारे देश के मा. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि सरकार अपने स्तर पर ट्रैक्टर रैली की अनुमति देनी है या नहीं ये वो कानून के तहत व्यवस्था स्थापित करें।

तो क्या जो किसानों ने ट्रैक्टर रैली की अनुमति मांगी थी तो उसमें लाल किला परिसर या उस ओर जाने वाला मार्ग शामिल था ? यदि नहीं तो उस ओर जाने वाले मार्ग पर सख्त सुरक्षा व्यवस्था कराना किसका काम था ? जबकि 26 जनवरी गणतंत्र दिवस जैसा देश का पावन पर्व भी अहूत किया जा रहा था, यदि कोई दुर्भाग्य से जो (मेरा इस तरह के वाक्य लिखने का कोई गलत मकसद नहीं) आतंकी घटना घट जाती तो उसके लिये प्रशासन किसको जिम्मेदार मानती, तो क्या इसी तरह से देश में गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल किले में ऐसी ही कडी और पुख्ता व्यवस्था की जाती है जैसी सुरक्षा व्यवस्था लाल किले की दिखी।

जब पुलिस को पहले से ज्ञात था कि ट्रैक्टर रैली के दौरान कोई साजिश रची जा रही है जिसके लिये पुलिस ने दावा भी किया था कि ट्रैक्टर रैली की अनुमती नहीं दी जा सकती है क्योंकि पकिस्तान से 3 सौ से ज्यादा वेबसाइड ट्रैक्टर रैली के आड में महौल बिगाडने की कोशिस कर सकती हैं, तो उसके मध्येनज़र सरकार की ओर से क्या व्यवस्था की गयी ? जबकि देश पहली बार गणतंत्र दिवस तो नहीं मना रहा था जिसका अनुमान सरकार की इंटेलीजेंस को नहीं था या उसे भापने में नाकाम रहा।

क्योंकर जब उपद्रवी ट्रैक्टर रैली के नाम उपद्रव मचा रहे थे तो सरकार के वो आला ऑफिसर कहाँ थे उन्होने तत्काल एक्शन लेना उचित नहीं समझा ? क्योंकर भारी पुलिस बल तैनात की गयी, क्योंकर उस लाल किले की सुरक्षा अर्धसैनिकों दी गयी ? जो लाल किला भारत शीष माना जाता है उसे झुकने के लिये क्योंकर उसे खुला रास्ता दिया गया ? क्योंकर उसी वक्त उन सभी उपद्रवियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया ?इसके पीछे सरकार और प्रशासन की क्या मंशा थी ? क्या इसे सोची समझी साजिश के तहत सब कुछ करने की छूट दी गयी ?

क्या ये कहना गलत होगा कि ये सब एक सोची समझी साजिश ही थी ? क्योंकि जो सतर्कता आज पुलिस दिखा रही है यदि यही सतर्कता पूर्व में दिखाई गयी होती तो क्या ऐसी घटना उपज भी सकती थी ? तो क्या ये एक सोची समझी साजिश के तहत किसान आंदोलन को ध्वस्त करने के लिये पुख्ता और कानूनी हथियार का इंतजाम नहीं माना जाना चाहिये ?

यदि जो व्यक्ति पहले से ही लिखित शर्तों पर हस्ताक्षर कर रहे वो इस मंशा को क्या अंजाम देने का विचार मात्र भी ला सकते हैं ? लेकिन यदि उनके द्वारा ऐसा कृत किया जा रहा था जो शर्तों के विपरीत था तो पुलिस द्वारा जिस जगह पर जिस भी व्यक्ति द्वारा ऐसा कृत किया जा रहा था तो उन्हे तत्काल प्रभाव से गिरफ्तार क्योंकर नहीं किया गया ?

अब सवाल ये उठता है कि जो व्यक्ति इस कार्य में लिप्त है या जिनके खिलाफ पुख्ता सवूत/साक्ष्य पुलिस के पास है उनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं कर रही जो उसके मुख्य आरोपी हैं ? उससे आंदोलन से या कर रहे बाकी किसानों और अन्नदाता के खिलाफ कार्यवाही क्यों ? क्या सरकार इसी मंशा के साथ ऐसी घटना को अंजाम देने के लिये घटित कराया गया ?

क्या किसान आंदोलन या अन्नदाता को ऐसी दमनकारी साजिश से उनका दम घोटा जायेगा ? क्या सरकार अन्नदाता के अधिकारों का इसी तरह हनन करेगी ? इससे देश के आम नागरिकों में क्या संदेश जायेगा ? इस पर क्या विचार सरकार कर रही है ?

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गणतंत्र या गन का तंत्र ?

लेकिन जो भी कुछ बॉर्डर पर दृश्य दिखायी दे रहे हैं ? क्या वो उचित है ? क्षेत्रीय जनता के नाम पर हिंदू सभा के लोग रैली कर आंदोलन समाप्त करने की मांग करना क्या उचित है ? जिसकी आड में क्या प्रशासन जबरन मारपीट कर आंदोलन समाप्त करायेगी ? क्या ये उचित निर्णय माना जायेगा ? क्या माननीय सर्वोच्च न्यायालय को इसपर संज्ञान नहीं लेना चाहिये ?

जिन्होने अब तक अन्नदाता के हित के मध्येनज़र निर्णय दिये ? क्या अपने स्वार्थ के चलते देश के मस्तक को धूमिल करने का जिन्होने पाप किया है क्या वाकई में उसका असली चेहरा सामने लाने के लिये उचित व्यवस्था नहीं करनी चाहिये ? माननीय सर्वोच्च न्यायालय का इसपर संज्ञान न लेना देश वासियों के समझ के परेय है।

कैंप की बिजली काटने का आरोप
भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सरकार पर आरोप लगाए कि पुलिस ने रात को इनके कैंप की बिजली काट दी। टिकैत ने कहा सरकार किसानों में डर का माहौल बना रही है। इसलिए लोग सारी रात जागते रहे। टिकैत ने कहा कि सरकार किसान आंदोलन को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। टिकैत ने कहा कि लाल किसे पर जो हुआ उसमें हमारा हाथ नहीं है और जिसने भी यह किया है उसके खिलाफ कार्रवाई तो होनी ही चाहिए।

बता दें कि बुधवार को दिल्ली पुलिस ने एक्शन लेते हुए उन सभी किसान नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जिन्होंने ट्रैक्टर रैली निकालने के लिए दी गई शर्तों पर दस्तखत किए थे। राकेश टिकैत भी उन किसानो नेताओं में शामिल हैं।

बागपत में पुलिस ने किसानों को खदेड़ा
दूसरी ओर बागपत में पुलिस प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 40 दिन से चल रहे धरने को जबरन खत्म करा दिया। आरोप है कि पुलिस कर्मियों ने दिल्ली-सहारनपुर हाईवे पर एक साइड पर बैठे सैकड़ों किसानों से मौके से खदेड़ते हुए टैंट तक उखाड़ फेंक दिए और लाठियां भी फटकारी। मौके पर तनाव को देखते हुए पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई है।

फिर खुला चिल्ला बॉर्डर
वहीं नए कृषि कानूनों को लेकर करीब दो माह से चिल्ला बॉर्डर पर धरना दे रहे भारतीय किसान यूनियन (भानू) ने बुधवार से अपना धरना वापस ले लिया। दिल्ली में मंगलवार को ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसक घटना तथा राष्ट्र ध्वज के अपमान से आहत होकर भानु गुट ने धरना वापस लिया है। वहीं लोक शक्ति दल ने अपना विरोध-प्रदर्शन जारी रखने की बात कही है। नोएडा यातायात पुलिस के अधिकारियों ने बताया कि बीकेयू (भानु) के विरोध वापस लेने के साथ ही चिल्ला बॉर्डर के माध्यम से दिल्ली-नोएडा मार्ग 57 दिनों के बाद यातायात के लिए फिर से खुल गया।

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