एनवायरनमेंट एंड हेल्थ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन; तापमान वृद्धि से जैविक संकेतकों और मानसिक स्थिति में बदलाव
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन के दौर में भीषण गर्मी का प्रतिकूल प्रभाव सिर्फ दिन की तपिश, चिलचिलाती धूप और पसीने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि रात का बढ़ता तापमान युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और नींद के चक्र को गंभीर रूप से बिगाड़ रहा है। हाल ही में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि सामान्य से अधिक गर्म रातों के दौरान युवाओं में चिंता (एंग्जायटी) का स्तर काफी तेजी से बढ़ता है। अध्ययन के अनुसार, दिन की तेज गर्मी की तुलना में रात के समय बढ़े हुए तापमान के संपर्क में रहने पर युवाओं में मानसिक तनाव और बेचैनी अधिक दर्ज की गई।
पर्यावरण और स्वास्थ्य अनुसंधान से जुड़े प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘एनवायरनमेंट एंड हेल्थ’ में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने विस्तृत विश्लेषण किया है कि दिन और रात के भिन्न-भिन्न तापमान मानव शरीर की जैविक कार्यप्रणाली और मानसिक स्थिति पर किस प्रकार असर डालते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि उच्च तापमान वाली रातों के दौरान युवाओं की नींद की गुणवत्ता और कुल अवधि में भारी गिरावट आती है। इसके अलावा, शरीर में तनाव हार्मोन और सूजन (इन्फ्लेमेशन) से जुड़े महत्वपूर्ण जैविक संकेतकों (बायोमार्कर्स) में भी नकारात्मक बदलाव देखे गए हैं।
शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि स्वास्थ्य और पर्यावरण के दृष्टिकोण से अब तक गर्मी के खतरों का आकलन करते समय मुख्य रूप से दिन के अधिकतम तापमान पर ही ध्यान दिया जाता रहा है, जो कि पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। जलवायु परिवर्तन के चलते अब रात के न्यूनतम तापमान में भी अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है, जिससे मानव शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा होने और मानसिक थकान से उबरने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रात के बढ़ते तापमान और उससे उत्पन्न होने वाले मानसिक व शारीरिक दुष्प्रभावों को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में यह स्थिति युवाओं की कार्यक्षमता, भावनात्मक संतुलन और दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा संकट बन सकती है। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में रात के तापमान के प्रबंधन और पर्याप्त वेंटिलेशन से जुड़े उपायों को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है।

