80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए गए भाषण पर विवाद; दास बोले—’सवाल पूछने वाले शिक्षित युवाओं को नक्सली कहना गलत’
नई दिल्ली:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने इस बयान पर कड़ा ऐतराज जताते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है।
सौरव दास ने कहा कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले और जवाबदेही मांगने वाले शिक्षित युवाओं को ‘नक्सली’ करार देना पूरी तरह से अनुचित और अलोकतांत्रिक है।
लाल किले से पीएम मोदी का संबोधन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त के अपने भाषण में आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा था:
- सशस्त्र नक्सलवाद का अंत: देश में हथियारों के बल पर चलने वाला नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है।
- ‘दिमागी नक्सल’ की चुनौती: कुछ तत्व समाज में वैचारिक स्तर पर अशांति, विभाजन और हिंसा फैलाने के अवसर तलाशते हैं।
- पहचान और अलगाव: समाज को ऐसे तत्वों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करना चाहिए और युवाओं को सकारात्मक रूप से मुख्यधारा से जोड़ना जरूरी है।
सौरव दास का पलटवार और मुख्य आरोप
| मुद्दा | सौरव दास (CJP प्रवक्ता) का रुख |
|---|---|
| ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर आपत्ति | शिक्षित युवाओं को केवल इसलिए नक्सली नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे बेरोजगारी, पेपर लीक या अन्य मुद्दों पर सरकार से सवाल करते हैं। |
| भयमुक्त माहौल और नया जागरण | 12 वर्षों के बाद देश में भय का माहौल टूटा है और जो युवा पीढ़ी पहले चुप थी, उसे अब शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध का मंच मिल चुका है। |
| हर जिले में ‘जंतर-मंतर’ | देश के हर जिले में एक नया ‘जंतर-मंतर’ तैयार हो रहा है, जहां निराश और कमजोर वर्ग अपनी एकजुट आवाज उठाएंगे। |
| विभाजन की राजनीति का आरोप | सरकार युवाओं और ‘जेन-जी’ (Gen-Z) को बांटने का प्रयास कर रही है, लेकिन एकजुट जनता ही सबसे बड़ी शक्ति है। |
स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर ‘दिमागी नक्सल’ बनाम ‘लोकतांत्रिक असहमति’ को लेकर बयानबाजी का दौर तेज हो गया है।

