लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में बदलाव का अधिकार संसद के पास, परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(सी) में हस्तक्षेप करने से मना
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों को बारी-बारी से रोटेट करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान साफ किया कि चुनावी क्षेत्रों के आरक्षण और उनके स्वरूप से जुड़े नीतिगत फैसले संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र में आते हैं, और न्यायपालिका इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर कोई आदेश जारी नहीं कर सकती।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई की। सुनवाई की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर चुटकी लेते हुए हल्के अंदाज में टिप्पणी की कि ‘आप गलत नंबर मिला रहे हैं, यह धरना-प्रदर्शन का मौसम है, आप भी ऐसा ही कीजिए।’ अदालत का स्पष्ट संकेत था कि नीतिगत बदलाव की यह गुहार अदालत के बजाय संसद और नीति-निर्माताओं के समक्ष लगाई जानी चाहिए।
याचिका में मांग की गई थी कि पंचायत और स्थानीय शहरी निकायों की तर्ज पर लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों को भी समय-समय पर रोटेशन के आधार पर बदला जाना चाहिए, ताकि अन्य क्षेत्रों के लोगों को भी प्रतिनिधित्व का समान अवसर मिल सके। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस पूर्व फैसले में किसी भी प्रकार का दखल देने से मना कर दिया, जिसमें परिसीमन कानून की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा गया था।
अदालत ने रेखांकित किया कि परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) के तहत यह स्पष्ट वैधानिक प्रावधान है कि एससी और एसटी समुदायों के लिए सीटें उन विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में आरक्षित की जाती हैं, जहां उनकी जनसंख्या का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक होता है। पीठ ने कहा कि यह व्यवस्था संसद द्वारा पारित कानून के तहत सोच-समझकर बनाई गई है, ताकि आरक्षित वर्गों को उनकी प्रभावी जनसंख्या के आधार पर उचित और वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके।
संविधान पीठ ने अपने संक्षिप्त आदेश में यह दोहराया कि विधायी ढांचे और चुनावी परिसीमन के मूलभूत सिद्धांतों में संशोधन करना केवल जनप्रतिनिधियों और संसद का दायित्व है। अदालत कानून की व्याख्या कर सकती है, लेकिन संसद के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करके नई आरक्षण नीतियां तय नहीं कर सकती। इस टिप्पणी के साथ ही शीर्ष अदालत ने मामले का अंतिम रूप से निपटारा कर दिया।

