नई दिल्ली, 26 मार्च 2026
पश्चिम एशिया संकट (ईरान-इस्राइल संघर्ष) को लेकर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर के एक बयान ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। बैठक के दौरान पाकिस्तान की मध्यस्थता की खबरों पर टिप्पणी करते हुए विदेश मंत्री ने कहा था, “हम पाकिस्तान जैसे दलाल (Broker) देश नहीं हैं,” और भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर अडिग है। इस बयान के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार की ‘हगिंग डिप्लोमेसी’ (गले मिलने वाली कूटनीति) पर सवाल उठाते हुए उसे पूरी तरह विफल करार दिया है।
कांग्रेस के मुख्य आरोप और सवाल:
- कूटनीतिक विफलता: जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत कूटनीति के बावजूद आज हालात ऐसे हैं कि पाकिस्तान जैसा “कमजोर देश” भी मध्यस्थ की भूमिका में दिख रहा है, जबकि भारत ‘मूकदर्शक’ बना हुआ है।
- दोहरा मापदंड: पवन खेड़ा ने तीखा सवाल किया कि यदि मध्यस्थता करने वाला देश ‘दलाल’ है, तो क्या रूस-यूयूक्रेन युद्ध के समय मध्यस्थता की कोशिश करते समय भारत भी वही था? उन्होंने इसे सरकार की दोहरी सोच बताया।
- सक्रियता की कमी: तारिक अनवर सहित अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि पश्चिम एशिया के मुद्दे पर भारत की प्रतिक्रिया बेहद कमजोर और अस्पष्ट है।
सरकार का पक्ष और स्पष्टीकरण: सरकार ने विपक्ष के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए निम्नलिखित बिंदु स्पष्ट किए हैं:
- ऐतिहासिक संदर्भ: सरकार ने कहा कि पाकिस्तान 1981 से ही अमेरिका के लिए इस तरह की भूमिका निभाता रहा है, इसमें कुछ नया नहीं है।
- स्वतंत्र नीति: विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत किसी के दबाव में काम नहीं करता और उसकी नीति ‘राष्ट्र प्रथम’ पर आधारित है।
- वैश्विक संवाद: प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप से स्पष्ट कहा है कि ईरान-इस्राइल युद्ध जल्द समाप्त होना चाहिए क्योंकि इसका वैश्विक प्रभाव पड़ रहा है।
- प्राथमिकता: सरकार की पहली प्राथमिकता खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा और देश की ऊर्जा जरूरतों (तेल आपूर्ति) को निर्बाध रखना है।
विपक्ष ने सरकार के जवाबों को असंतोषजनक बताते हुए अब इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा की मांग की है।

