मुंबई/ठाणे: महाराष्ट्र के बहुचर्चित और हाई-प्रोफाइल केतन अग्रवाल मर्डर केस (Ketan Agrawal Murder Case) में एक बहुत बड़ा विधिक मोड़ सामने आया है। देश के सबसे प्रतिष्ठित और वरिष्ठ क्रिमिनल लॉयर उज्ज्वल निकम (Ujjwal Nikam) को इस मामले में राज्य सरकार की ओर से स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (विशेष लोक अभियोजक) नियुक्त किया गया है। दूसरी तरफ, मामले की मुख्य आरोपी सिया गोयल के विधिक पक्ष ने भी अपनी रणनीति स्पष्ट करते हुए आगामी 29 जून को कोर्ट में पुलिस रिमांड का विरोध करने का ऐलान किया है।
स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उज्ज्वल निकम ने शुक्रवार (26 जून 2026) को इस विधिक नियुक्ति की पुष्टि की। निकम ने बताया:
“शुक्रवार दोपहर मुझे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का फोन आया था। मुख्यमंत्री ने मुझे सूचित किया कि मृतक केतन अग्रवाल के परिजनों ने उनसे व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर इस मामले की विधिक पैरवी मेरे हाथों में सौंपने का विशेष अनुरोध किया था। पीड़ित परिवार की भावना और मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने मुझसे स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर जिम्मेदारी संभालने का आग्रह किया, जिसे मैंने विधिक न्याय के हित में स्वीकार कर लिया है।”
1. आरोपी सिया गोयल के वकील की विधिक दलीलें और रणनीति
इस बीच, मामले की आरोपी सिया गोयल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील आशुतोष श्रीवास्तव ने शुक्रवार को मीडिया से विस्तृत विधिक बातचीत की। उन्होंने जांच की दिशा और अपनी मुवक्किल के विधिक अधिकारों को लेकर निम्नलिखित मुख्य बिंदु सामने रखे:
- हादसे से हत्या तक का विधिक सफर: एडवोकेट श्रीवास्तव ने बताया कि शुरुआत में इस मामले को स्थानीय पुलिस द्वारा एक ‘हादसे में हुई मौत’ (Accidental Death) के रूप में विधिक रूप से दर्ज किया गया था। हालांकि, बाद में परिस्थितियों की समीक्षा के बाद पुलिस ने इसमें हत्या (Murder) का विधिक एंगल जोड़कर नए सिरे से जांच शुरू की है, जो फिलहाल जारी है।
- स्वतंत्र गवाह का अभाव: बचाव पक्ष के वकील ने दावा किया कि वर्तमान में पुलिस के पास ऐसा कोई भी ‘स्वतंत्र या चश्मदीद गवाह’ (Independent Witness) मौजूद नहीं है, जो विधिक रूप से यह प्रमाणित कर सके कि सिया गोयल ने केतन अग्रवाल की हत्या की है या वे इस विधिक अपराध में सीधे तौर पर संलिप्त रही हैं।
- जांच में पूर्ण सहयोग: उन्होंने स्पष्ट किया कि सिया गोयल पुलिस की विधिक जांच में पूरी तरह सहयोग कर रही हैं ताकि पुलिस किसी उचित निष्कर्ष पर पहुंचकर एक त्रुटिहीन चार्जशीट दाखिल कर सके और विधिक सच्चाई कोर्ट के सामने आ सके।
2. “पुलिस के सामने दिया गया बयान विधिक रूप से मान्य नहीं”विधिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए आशुतोष श्रीवास्तव ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को रेखांकित किया:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 की धारा 23: उन्होंने स्पष्ट किया कि नए विधिक कोड यानी भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 23 के तहत, पुलिस कस्टडी या पुलिस के समक्ष दिया गया कोई भी इकबालिया बयान (Confession) न्यायालय में स्वीकार्य साक्ष्य नहीं माना जाता है।
- मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान अनिवार्य: कोई भी बयान कोर्ट में तभी विधिक साक्ष्य बनता है जब वह पुलिस की अनुपस्थिति में, पूर्णतः स्वैच्छिक रूप से और कानून द्वारा निर्धारित विधिक प्रक्रिया के तहत सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) के समक्ष दर्ज कराया गया हो। इसके साथ ही भारतीय संविधान और कानून किसी भी आरोपी को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य (Self-Incrimination) देने के लिए विधिक रूप से बाध्य करने की अनुमति नहीं देता।

