सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश और मेडिकल सुविधाओं का दिया हवाला, गुजरात सरकार ने किया था अर्जी का कड़ा विरोध
अहमदाबाद: गुजरात उच्च न्यायालय ने मंगलवार को स्वयंभू संत आसाराम की 20 दिन की अस्थायी जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। आसाराम वर्ष 2013 के एक दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं। न्यायमूर्ति गीता गोपी और न्यायमूर्ति एल एस पीरजादा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में इस स्तर पर उनकी याचिका पर विचार करने का कोई ठोस आधार नजर नहीं आता है।
उच्चतम न्यायालय के आदेश का दिया हवाला खंडपीठ ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि उच्चतम न्यायालय ने पिछले महीने दिए अपने आदेश में आसाराम को स्वास्थ्य बिगड़ने की स्थिति में सीधे शीर्ष अदालत से संपर्क करने की स्वतंत्रता पहले ही दे रखी है। इसके अलावा जेल प्रशासन द्वारा उन्हें चौबीसों घंटे देखभालकर्ता (केयरटेकर) और आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाएं भी मुहैया कराई गई हैं, ऐसे में अस्थायी रिहाई का कोई औचित्य नहीं बनता।
राजस्थान हाईकोर्ट की पैरोल को बनाया था आधार जोधपुर जेल में बंद आसाराम की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने 3 अगस्त को एक अन्य दुष्कर्म मामले में उन्हें 20 दिन की पैरोल प्रदान की थी। याचिकाकर्ता के वकीलों का तर्क था कि चूंकि वे गुजरात के मामले में भी न्यायिक हिरासत में हैं, इसलिए जब तक इस अदालत से राहत नहीं मिलती, तब तक राजस्थान से मिली पैरोल का लाभ नहीं लिया जा सकता।
गुजरात सरकार की ओर से पेश अभियोजन पक्ष ने इस जमानत अर्जी का कड़ा विरोध किया। गौरतलब है कि आसाराम की मूल सजा को निलंबित करने से जुड़ी मुख्य याचिका पहले से ही उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद आसाराम को फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।

