धर्मों के टकराव और जानमाल के नुकसान पर जताई गहरी चिंता; नई पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने पर दिया जोर
मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत की सांस्कृतिक बहुलता और समावेशी स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा है कि देश की वास्तविक पहचान यहां की विभिन्न भाषाओं, धर्मों, जातियों और अनूठी संस्कृतियों के समन्वय से बनती है। शुक्रवार को मुंबई के प्रभादेवी इलाके में आयोजित एक प्रबुद्ध कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत अपने समृद्ध पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति का संतुलन बनाकर दुनिया को एक बेहतर और शांतिपूर्ण स्थान बनाने में निर्णायक योगदान दे सकता है।
आरएसएस प्रमुख ने समकालीन सामाजिक परिदृश्य पर चर्चा करते हुए नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि युवाओं को भारतीय समाज, उसके समृद्ध इतिहास और सदियों पुरानी परंपराओं की सही जानकारी दी जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि समाज को संकीर्णता से दूर रहकर दुनिया भर से प्राप्त होने वाले ज्ञान, नवाचार और श्रेष्ठ विचारों को खुले दिल से अपनाना चाहिए, ताकि उसका उपयोग समग्र मानव जाति और समाज के कल्याण के लिए किया जा सके।
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने एक वैश्विक अंतरधार्मिक बैठक के अनुभव को साझा करते हुए धर्मों के बीच बढ़ते टकराव पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि उस संवाद के दौरान एक प्रतिनिधि ने उनसे भावुक होकर कहा था कि दुनिया भर में धर्मों के आपसी विवादों और कट्टरता के कारण निर्दोष लोगों की जानें जा रही हैं, लेकिन इस जटिल संकट का समाधान आसानी से नजर नहीं आ रहा है।
संघ प्रमुख ने संकेत दिया कि भारत का सनातन दर्शन और सर्वसमावेशी सोच ही ऐसे वैश्विक वैचारिक संघर्षों को शांत करने का वास्तविक मार्ग दिखा सकती है, जहां विविधता को विभाजन का कारण नहीं बल्कि समाज की साझी शक्ति माना जाता है।

