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Sunday, October 25, 2026

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नई दिल्ली: मोहन भागवत की टिप्पणी पर कपिल सिब्बल का पलटवार, कहा- भारत में लोकतांत्रिक तरीके से होगा बदलाव

नेपाल और बांग्लादेश से तुलना करने पर उठाए सवाल, बोले- देश में हिंसा नहीं, चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन चाहते हैं लोग

नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा देश में सरकार बदलने को लेकर की गई हालिया टिप्पणी पर राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कड़ा पलटवार किया है। वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद सिब्बल ने स्पष्ट किया कि भारत में सरकार बदलने की आकांक्षा रखने वाले नागरिक पूरी तरह लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते पर विश्वास करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि संघ प्रमुख जमीनी हकीकत और जनता के इस लोकतांत्रिक संकल्प को स्वीकार करने से बच रहे हैं।

सिब्बल ने मोहन भागवत की उस तुलनात्मक टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज जताया, जिसमें उन्होंने भारत में सत्ता परिवर्तन की मांग को नेपाल, बांग्लादेश, अल्बानिया और फ्रांस में हुए हालिया अशांत घटनाक्रमों के समकक्ष रखा था। सिब्बल ने कहा कि उन देशों में खुले जन-विद्रोह के चलते बड़े पैमाने पर हिंसा और अराजकता फैली थी, जिसका वह या देश का कोई भी जिम्मेदार नागरिक कभी समर्थन नहीं कर सकता।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था और जनता का मिजाज पूरी तरह भिन्न है। यहां के लोग किसी हिंसक रास्ते के बजाय निष्पक्ष चुनाव प्रणाली और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के जरिए सत्ता परिवर्तन में भरोसा रखते हैं। उन्होंने कहा कि देश में आज एक बड़े राजनीतिक बदलाव की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है और जनता ने इसके लिए अपना मन भी बना लिया है, हालांकि यह बदलाव कब और किस रूप में सामने आएगा, इसका फैसला समय करेगा।

अपने तर्क के समर्थन में सिब्बल ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि राजधानी में अपनी मांगों को लेकर जुटे युवाओं ने पूरी तरह शांतिपूर्ण और गांधीवादी तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया था। प्रदर्शनकारियों के पास न तो कोई हथियार थे और न ही उन्होंने कोई पत्थरबाजी की, बल्कि उन्होंने अपनी बात रखने के लिए भूख हड़ताल जैसे अहिंसक लोकतांत्रिक माध्यम का सहारा लिया था।

संबोधन के अंत में सिब्बल ने दोहराया कि शांतिपूर्ण विरोध और चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने की मांग करना हर भारतीय नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक असंतोष को विदेशी उपद्रवों या हिंसक विद्रोहों से जोड़कर देखना अनुचित है और देश की जनता अपनी लोकतांत्रिक चेतना के बल पर ही सही समय पर सही निर्णय लेगी।

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