कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के निजी सहयोगी (PA) सुमित राय को तगड़ा विधिक झटका लगा है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भूमि सौदे में हुए कथित धोखाधड़ी के एक मामले में सुमित राय की अग्रिम जमानत याचिका (Anticipated Bail Petition) पर तत्काल विधिक सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब इस संवेदनशील मामले की सुनवाई नियमित पीठ (Regular Bench) के समक्ष ही होगी।
1. तत्काल विधिक सुनवाई से क्यों मुकरा न्यायालय?
मंगलवार (30 जून 2026) को यह मामला कलकत्ता हाईकोर्ट की अवकाशकालीन/विशेष पीठ में न्यायमूर्ति शुभ्रा घोष की अदालत के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था। हालांकि, अदालत ने निम्नलिखित विधिक आधारों पर त्वरित सुनवाई की मांग को खारिज कर दिया:
- अधूरी विधिक सूचना: सुमित राय के वकीलों द्वारा राज्य सरकार के विधि विभाग को इस याचिका की विधिवत और समय पर कानूनी सूचना (Formal Notice) नहीं दी गई थी।
- दस्तावेजों का अभाव: याचिका के साथ जुड़े कुछ बेहद आवश्यक और अनिवार्य विधिक दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए गए थे।
- अदालत का विधिक रुख: न्यायमूर्ति शुभ्रा घोष ने स्पष्ट किया कि जब तक सभी विधिक औपचारिकताएं और दस्तावेज पूर्ण नहीं होते, तब तक मामले की तात्कालिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अतः इस पर अब नियमित पीठ ही विचार करेगी।
2. ‘कठोर कार्रवाई’ से सुरक्षा देने की मांग खारिज; गिरफ्तारी की तलवार लटकी
सुनवाई के दौरान सुमित राय के डिफेंस काउंसिल (अधिवक्ता) ने अदालत से एक अंतरिम विधिक सुरक्षा की गुहार लगाई थी। उन्होंने अनुरोध किया कि यदि उनका मुवक्किल जांच में सहयोग करने के लिए पुलिस के समक्ष उपस्थित होता है, तो पुलिस को उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक या कठोर विधिक कार्रवाई (Coercive Action) करने से रोका जाए।
महाधिवक्ता की दलील और पुलिस को खुली छूट:
- कोई अंतरिम राहत नहीं: अदालत ने सुमित राय को गिरफ्तारी या किसी भी प्रकार की विधिक कार्रवाई से कोई अंतरिम संरक्षण (Interim Protection) प्रदान नहीं किया।
- अतिरिक्त महाधिवक्ता का कड़ा रुख: राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार ने अदालत के सामने स्पष्ट विधिक स्थिति रखते हुए कहा— “चूंकि माननीय न्यायालय ने आरोपी को कोई अंतरिम विधिक संरक्षण नहीं दिया है, इसलिए पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर कोई कानूनी रोक (Legal Bar) नहीं रह जाती है। ऐसे में कानून के स्थापित प्रावधानों के अनुसार जांच एजेंसी आरोपी को गिरफ्तार करने या आगे की विधिक कार्रवाई के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।”

