चुनाव आयोग की पूर्व मंजूरी आवश्यक नहीं; जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत निजी शिकायत को माना कानूनी रूप से वैध
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी शुचिता और उम्मीदवारों की पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि चुनाव लड़ने वाले किसी भी उम्मीदवार द्वारा नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में गलत जानकारी देने या आवश्यक तथ्य छिपाने पर कोई भी सामान्य नागरिक उसके विरुद्ध सीधे आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है। अदालत ने साफ किया कि ऐसी शिकायत दर्ज कराने के लिए मतदाताओं को केवल चुनाव आयोग या अधिकृत लोकसेवकों की मंजूरी पर निर्भर रहने की बाध्यता नहीं है।
शीर्ष अदालत की पीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए की व्याख्या करते हुए यह व्यवस्था दी। यह धारा उन प्रत्याशियों को दंडित करने का प्रावधान करती है जो नामांकन के समय अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि, संपत्ति, देनदारियों या शैक्षणिक योग्यता को लेकर झूठी घोषणा करते हैं अथवा वास्तविक विवरण छिपाते हैं। अदालत ने कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है जो किसी जागरूक नागरिक को झूठे हलफनामे के विरुद्ध अदालत की शरण लेने से रोकता हो।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 195 की कठोर शर्तें ऐसे मामलों में निजी आपराधिक शिकायत दर्ज कराने के रास्ते में बाधा नहीं बनेंगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी जनप्रतिनिधि को दुर्भावनापूर्ण तरीके से परेशान करने के लिए निराधार शिकायत दाखिल करता है, तो कानून सक्षम मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक स्तर पर ही तथ्यों की जांच कर उचित आदेश देने की पर्याप्त शक्तियां प्रदान करता है।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव प्रणाली में प्रत्येक मतदाता को अपने उम्मीदवार के बारे में सत्य और सटीक जानकारी पाने का बुनियादी अधिकार है। ऐसे में यदि कोई प्रत्याशी जानबूझकर भ्रामक ब्योरा पेश करता है, तो जनता को कानूनी कार्रवाई की पहल करने से वंचित नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत के इस फैसले से चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रत्याशियों की जवाबदेही और अधिक सुदृढ़ होने की उम्मीद है।

