नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि एक शिक्षित और पेशेवर रूप से योग्य महिला द्वारा अपने करियर को आगे बढ़ाने का निर्णय ‘क्रूरता’ (Cruelty) या ‘परित्याग’ (Desertion) की श्रेणी में नहीं आता। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने निचली अदालतों के उन निष्कर्षों को खारिज कर दिया, जिनमें एक महिला दंत चिकित्सक की पेशेवर महत्वाकांक्षाओं को वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन माना गया था।
फैमिली कोर्ट के ‘सामंती दृष्टिकोण’ पर प्रहार
सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट और गुजरात हाई कोर्ट की उन टिप्पणियों की कड़ी आलोचना की, जिनमें महिला के अलग रहने के फैसले को गलत ठहराया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा:
एक योग्य महिला के करियर प्रयासों को ‘क्रूरता’ कहना सामंती, पिछड़ा और अति रूढ़िवादी दृष्टिकोण है।
यह सोच कि पत्नी की पेशेवर पहचान पति की इच्छाओं के अधीन है, 21वीं सदी में स्वीकार्य नहीं है।
फैसले के मुख्य बिंदु: स्वायत्तता और पहचान
अदालत ने महिला की स्वायत्तता और व्यक्तिगत पहचान पर जोर देते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
वैवाहिक वीटो: पत्नी की पेशेवर पहचान पति के किसी ‘निहित वीटो’ के अधीन नहीं है। विवाह उसकी अपनी पहचान को धूमिल नहीं करता।
बच्चे का भविष्य: अपने बच्चे के लिए एक स्थिर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने और करियर के लिए अलग रहने का फैसला वैवाहिक कर्तव्यों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
पेशेवर योग्यता: एक महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपनी कठिन परिश्रम से अर्जित डिग्री और योग्यता को केवल इसलिए त्याग दे क्योंकि वह पति के साथ उसके कार्यस्थल (जो कि इस मामले में दूरस्थ स्थान पर तैनात एक सैन्य अधिकारी थे) पर नहीं रह सकती।
तलाक की डिक्री का आधार बदला
अदालत ने पाया कि चूंकि पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई उम्मीद नहीं बची है, इसलिए ‘विवाह के अपूरणीय रूप से टूटने’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक की डिक्री को बरकरार रखा गया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि इसे महिला द्वारा की गई ‘क्रूरता’ या ‘परित्याग’ के आधार पर नहीं माना जाएगा।

