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Tuesday, July 7, 2026

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संपादकीय – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर न्यायपालिका की मजबूत मुहर

संपादक की कलम से – रवि जी. निगम

“कानून-व्यवस्था” के नाम पर असहमति दबाने की प्रवृत्ति पर हाईकोर्ट का सख्त रुख

मुंबई – बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल शांतिपूर्ण विरोध, धरना या सरकार की नीतियों के खिलाफ असहमति को “कानून-व्यवस्था” का खतरा बताकर दंडात्मक कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह मामला एक्सटर्नमेंट आदेश से संबंधित था, जिसमें एक व्यक्ति को उसकी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण क्षेत्र से बाहर करने का आदेश दिया गया था। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था जो यह साबित करे कि याचिकाकर्ता की गतिविधियाँ हिंसा या सार्वजनिक खतरे का कारण बन रही थीं।

असहमति का लोकतांत्रिक अधिकार और पुलिसिया अतिरेक पर हाईकोर्ट का चाबुक

हाईकोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध, धरना या सरकार की नीतियों से असहमति जताना कोई अपराध नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि महज़ राजनीतिक और सामाजिक विरोध को “कानून-व्यवस्था” के लिए खतरा बताकर किसी नागरिक के खिलाफ तड़ीपार या जिलाबदर (externment) जैसी दंडात्मक और दमनकारी कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति श्री माधव जे. जामदार का यह फैसला उस समय आया है, जब देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग अक्सर असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए करने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में यह निर्णय कार्यपालिका की निरंकुशता पर न्यायपालिका का एक कड़ा और जरूरी प्रहार है।

असाधारण शक्तियों का सामान्यीकरण और संवैधानिक अधिकारों की जीत

महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत मिलने वाली ‘एक्सटर्नमेंट’ या तड़ीपार की शक्ति वास्तव में एक असाधारण कानूनी उपाय है, जिसका इस्तेमाल आदतन अपराधियों, गैंगस्टरों और समाज के लिए वास्तविक खतरा बन चुके तत्वों के खिलाफ होना चाहिए। लेकिन जब प्रशासन इस गंभीर कानून को राजनीतिक विरोधियों या सामाजिक कार्यकर्ताओं को हटाने का जरिया बना लेता है, तो यह कानून के शासन (Rule of Law) का मखौल बन जाता है। हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की पुनर्पुष्टि करते हुए याद दिलाया है कि लोकतंत्र और प्रशासनिक सुविधा दो अलग बातें हैं; प्रशासनिक असुविधा या राजनीतिक असहजता के आधार पर किसी नागरिक को उसके मूल अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। यह ऐतिहासिक फैसला कानून प्रवर्तन एजेंसियों को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश देता है कि असहमति लोकतंत्र की धड़कन है, कोई गुनाह नहीं। यदि व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाए रखना है, तो शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान करना ही होगा, क्योंकि विरोध को दबाने की कोशिशें लोकतंत्र को कमज़ोर और तानाशाही को मजबूत करती हैं।

मानवाधिकार अभिव्यक्ति की ओर से न्यायालय को सम्मान और हार्दिक आभार

“मानवाधिकार अभिव्यक्ति” इस ऐतिहासिक निर्णय के लिए माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री माधव जे. जामदार के प्रति गहरा सम्मान और हार्दिक आभार प्रकट करती है। यह निर्णय न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, बल्कि पूरे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह निर्णय लोकतंत्र और प्रशासनिक शक्ति के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि लोकतंत्र में विरोध को दबाया नहीं जा सकता, बल्कि उसे संवैधानिक सीमाओं के भीतर सम्मान दिया जाना चाहिए।

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