लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले में देरी के बाद टीएमसी का बड़ा कदम; बागी सांसदों ने NCPI में विलय का किया है दावा
नई दिल्ली:
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में आई बड़ी राजनीतिक टूट का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचने जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी अपने 20 बागी लोकसभा सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर अगले 7 से 10 दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में याचिका दाखिल कर सकती है।
यह कदम लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा अयोग्यता याचिकाओं (Disqualification Petitions) पर मानसून सत्र समाप्त होने तक कोई अंतिम निर्णय न लिए जाने के बाद उठाया जा रहा है।
अभिषेक बनर्जी ने दी थी चेतावनी
टीएमसी के लोकसभा में नेता अभिषेक बनर्जी ने बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अयोग्यता याचिकाओं पर त्वरित निर्णय लेने का अनुरोध किया था:
- समयसीमा का हवाला: अभिषेक बनर्जी ने स्पष्ट किया था कि यदि स्पीकर निर्धारित न्यायिक दिशानिर्देशों के तहत उचित समय में फैसला नहीं लेते हैं, तो पार्टी संविधान के तहत अदालत का रुख करने के लिए बाध्य होगी।
- प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात: बनर्जी के साथ टीएमसी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय, कीर्ति आजाद और प्रतिमा मंडल ने भी इस मुद्दे पर स्पीकर से औपचारिक पत्राचार किया था।
क्या है पूरा विवाद?
| पहलू | विवरण व राजनीतिक स्थिति |
|---|---|
| बागियों का कदम | 20 टीएमसी सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा की है और एनडीए (NDA) को समर्थन दिया है। |
| प्रमुख चेहरे | बागी गुट में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय और मिताली बाग जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं। |
| दो-तिहाई (2/3) का तर्क | बागी सांसदों का दावा है कि वे टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सदस्यों के दो-तिहाई से अधिक हैं, इसलिए संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत उन पर अयोग्यता लागू नहीं होती। |
| टीएमसी की चुनौती | टीएमसी का तर्क है कि महज बाहर विलय की घोषणा से दलबदल विरोधी कानून की शर्तें पूरी नहीं होतीं और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के कारण ये सांसद अयोग्यता के दायरे में आते हैं। |
सुप्रीम कोर्ट का रुख और स्पीकर की शक्तियां
संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता पर निर्णय लेने का प्राथमिक अधिकार लोकसभा अध्यक्ष के पास होता है, जहां वे एक ट्रिब्यूनल की भूमिका में काम करते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे 2023 का महाराष्ट्र राजनीतिक संकट) में यह स्पष्ट किया है कि:
- स्पीकर का निर्णय या निर्णय न लेना न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आता है।
- अयोग्यता याचिकाओं पर निष्पक्ष और उचित समय (साधारणतः 3 महीने) के भीतर निर्णय लिया जाना संवैधानिक रूप से आवश्यक है।
मानसून सत्र की समाप्ति के बाद अब टीएमसी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ले जाकर समयबद्ध फैसला सुनाने का निर्देश देने की मांग करेगी।

