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Tuesday, July 28, 2026

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देश में रैगिंग के मामले: उत्तर प्रदेश फिर टॉप पर, 2022 से अब तक दर्ज हुईं 825 शिकायतें

UGC और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद UP में सबसे ज्यादा मामले; पूर्वोत्तर के राज्यों ने पेश की मिसाल

नई दिल्ली: देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और सुप्रीम कोर्ट के कड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद इस गंभीर समस्या पर पूरी तरह लगाम नहीं लग सकी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 से 22 जुलाई 2026 के बीच उत्तर प्रदेश देश में सबसे ज्यादा रैगिंग शिकायतों वाला राज्य बना हुआ है।

इस अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश के मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग की रिकॉर्ड 825 शिकायतें दर्ज की गई हैं, जिनमें अकेले वर्ष 2026 (22 जुलाई तक) की 135 शिकायतें शामिल हैं।

देशभर में दर्ज हुईं 4,024 शिकायतें: ये राज्य हैं सबसे आगे

वर्ष 2022 से 22 जुलाई 2026 तक देशभर में कुल 4,024 रैगिंग शिकायतें दर्ज की गईं।

  • शीर्ष राज्य: रैगिंग शिकायतों के मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है, जिसके बाद पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार का नंबर आता है।
  • कम मामले वाले बड़े राज्य: तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या उत्तर प्रदेश से अधिक होने के बावजूद वहां शिकायतों का आंकड़ा तुलनात्मक रूप से काफी कम रहा।
  • 107 संस्थानों को नोटिस: वर्ष 2025 में यूजीसी ने रैगिंग रोकने के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन न करने पर 18 मेडिकल कॉलेजों सहित कुल 107 संस्थानों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

विभिन्न राज्यों में साल-दर-साल रैगिंग के आंकड़े (2022-2026*)

राज्य / केंद्र शासित प्रदेश20222023202420252026 (22 जुलाई तक)
उत्तर प्रदेश97154188251135
मध्य प्रदेश73828711763
राजस्थान3242547544
दिल्ली1826313327
उत्तराखंड1928254921
हरियाणा822284819
पंजाब189222513
जम्मू-कश्मीर151814176
हिमाचल प्रदेश5129144
चंडीगढ़01012

पूर्वोत्तर के राज्यों ने कैसे पाई रैगिंग पर सफलता?

सिक्किम, मिजोरम, नगालैंड और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्यों ने रैगिंग पर पूरी तरह लगाम लगाकर एक अनुकरणीय मिसाल पेश की है। इन राज्यों में अब रैगिंग की शिकायतें शून्य तक पहुंच गई हैं। इसके पीछे मुख्य कारण रहे:

  1. त्वरित कार्रवाई: पहली शिकायत मिलते ही प्रशासन, शिक्षकों और अभिभावकों की संयुक्त त्वरित कार्रवाई।
  2. संवाद और जुड़ाव: सीनियर और जूनियर छात्रों के बीच बेहतर संवाद व सकारात्मक माहौल तैयार करना।
  3. स्कूली स्तर पर जागरूकता: 11वीं और 12वीं कक्षा से ही छात्रों को एंटी-रैगिंग कानूनों और उसके गंभीर कानूनी परिणामों की जानकारी देना।

यूजीसी की सख्ती के बाद भी चुनौती क्यों?

विशेषज्ञों का मानना है कि यूजीसी द्वारा लगातार निर्देश देने और 107 संस्थानों को कारण बताओ नोटिस जारी करने के बावजूद कई कॉलेजों में एंटी-रैगिंग कमेटियों का निष्क्रिय होना और नियमों का कड़ाई से पालन न होना सबसे बड़ा कारण है। जिन राज्यों में जागरूकता और सामुदायिक निगरानी पर जोर दिया जा रहा है, वहां बेहतर नतीजे दिखे हैं, जबकि अन्य राज्यों में प्रशासनिक लापरवाही के कारण मामले लगातार बढ़ रहे हैं।

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