सीआईसी पंजीकरण रद्द करने के आवेदन पर 28 महीने में तीन बार बदले नियम, पारदर्शिता पर डिस्क्लोजर का दिया सुझाव
मुंबई: टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस की नियामकीय स्थिति, मालिकाना हक के ढांचे और शेयर बाजार में संभावित लिस्टिंग को लेकर कानूनी व वित्तीय गलियारों में विवाद गहराने लगा है। विलय और अधिग्रहण (एमएंडए) मामलों के जाने-माने वरिष्ठ कॉर्पोरेट वकील नितिन पोतदार ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के उस अधिकार क्षेत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके आधार पर टाटा संस को अपनी हिस्सेदारी बेचने अथवा मालिकाना ढांचे में बड़ा बदलाव करने के लिए कहा जा रहा है। पोतदार का मानना है कि केंद्रीय बैंक की प्राथमिक चिंता यदि प्रणालीगत पारदर्शिता को लेकर है, तो इसके लिए कंपनी पर अनिवार्य लिस्टिंग का दबाव बनाने के बजाय कड़े डिस्क्लोजर और प्रकटीकरण के नियम लागू किए जाने चाहिए।
20,000 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाने के बाद भी नियमों की जटिलता मामले के तकनीकी पहलुओं को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता नितिन पोतदार ने बताया कि टाटा संस ने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) के रूप में अपना पंजीकरण आधिकारिक रूप से वापस लेने के लिए आरबीआई के समक्ष विधिवत आवेदन किया था। आवेदन करने से पहले कंपनी ने अपने समस्त कर्जदाताओं को 20,000 करोड़ रुपये की पूरी देनदारी का समय पर भुगतान कर दिया था। इस वित्तीय कदम का मुख्य उद्देश्य स्वयं को गैर-ऋणग्रस्त इकाई के रूप में स्थापित करना था, ताकि उस पर भारी-भरकम वित्तीय जोखिम से जुड़े कड़े नियम अनिवार्य रूप से लागू न हों।
28 महीने की प्रक्रिया में तीन बार बदले गए नियामक नियम पोतदार ने प्रक्रियात्मक देरी पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि टाटा संस के आवेदन पर केंद्रीय बैंक स्तर पर करीब 28 महीने तक निर्णय लंबित रहा और इसी समयावधि के दौरान आरबीआई ने अपने नियमों में तीन बार बदलाव कर दिए। उन्होंने तर्क दिया कि जब किसी निजी समूह ने वित्तीय संस्थाओं और कर्जदाताओं का पाई-पाई बकाया चुकता कर दिया हो, तो उसे शेयर बाजार में लिस्ट होने या अपनी हिस्सेदारी पुनर्गठित करने के लिए लगातार बाध्य करना कॉर्पोरेट स्वायत्तता के सिद्धांतों के लिहाज से विचारणीय प्रश्न खड़ा करता है।

