असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए सियासी बिसात बिछ चुकी है। 9 अप्रैल को होने वाले एक चरण के मतदान से पहले राज्य में ‘घुसपैठ’ और ‘डेमोग्राफी’ (जनसांख्यिकी) सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनकर उभरे हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा आक्रामक तरीके से असमिया पहचान और अवैध प्रवासन का मुद्दा उठा रहे हैं, जबकि कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के नेतृत्व में विपक्ष बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और 15 साल की कथित ‘सत्ता विरोधी लहर’ (Anti-incumbency) के दम पर सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रहा है।
दलबदल और टिकटों का गणित
भाजपा ने इस बार 126 में से 89 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि बाकी सीटें सहयोगियों (AGP और BPF) के लिए छोड़ी हैं। पार्टी ने 19 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर कड़ा संदेश दिया है, जिनमें कैबिनेट मंत्री नंदिता गरलोसा भी शामिल हैं। टिकट कटने से नाराज गरलोसा भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गई हैं और अब हाफलोंग सीट से चुनाव लड़ेंगी। दूसरी ओर, कांग्रेस को भी झटके लगे हैं; पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा और सांसद प्रद्युत बोरदोलोई जैसे दिग्गज नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
प्रमुख चुनावी मुद्दे जो तय करेंगे हार-जीत
2023 के परिसीमन (Delimitation) के बाद असम का चुनावी समीकरण काफी बदल गया है। इस बार मुख्य मुकाबला इन मुद्दों पर केंद्रित है:
- घुसपैठ और एनआरसी (NRC): भाजपा इसे असमिया अस्मिता से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इसे केवल ध्रुवीकरण की राजनीति बता रही है।
- बेरोजगारी और चाय बागान: कांग्रेस बेरोजगारी को मुख्य मुद्दा बना रही है। चाय बागान श्रमिकों की मजदूरी और उनकी समस्याएं ऊपरी असम में निर्णायक साबित होंगी।
- जुबिन गर्ग की मृत्यु का मामला: असम के सांस्कृतिक गौरव जुबिन गर्ग की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु (सितंबर 2025) एक बड़ा भावनात्मक मुद्दा बन गया है। सरकार ने इसे ‘हत्या’ बताते हुए फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन किया है, जिसे विपक्ष चुनावी हथकंडा बता रहा है।
- बाढ़ और पुनर्वास: हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ और उससे निपटने में प्रशासन की विफलता भी चर्चा के केंद्र में है।
असम चुनाव 2026: एक नज़र में
| पक्ष | प्रमुख चेहरे | मुख्य रणनीति |
| NDA (भाजपा+) | हिमंत बिस्व सरमा, रंजीत दास | डेमोग्राफी सुरक्षा, विकास, सांस्कृतिक पहचान |
| UPA (कांग्रेस+) | गौरव गोगोई, नंदिता गरलोसा | बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, 15 साल की एंटी-इंकंबेंसी |

