मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई (Mumbai) की एक सत्र अदालत (Sessions Court) ने मानसिक रूप से दिव्यांग यानी ऑटिज्म (Autism) से पीड़ित एक युवती का कथित तौर पर यौन शोषण (Sexual Exploitation) करने वाले आरोपी को कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने मामले की संवेदनशीलता और क्रूरता को देखते हुए आरोपी की नियमित जमानत याचिका (Bail Plea) को पूरी तरह खारिज कर दिया। मामले पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायाधीश ने एक बेहद सख्त और महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में लगाए गए आपराधिक आरोप केवल एक असहाय दिव्यांग युवती के शारीरिक शोषण तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पीड़िता के असहाय परिवार द्वारा आरोपी पर किए गए अटूट सामाजिक भरोसे के गंभीर और आपराधिक दुरुपयोग (Breach of Trust) से भी गहरे जुड़े हुए हैं।
कमजोरी का फायदा उठाकर किया घिनौना कृत्य
अदालती दस्तावेजों और अभियोजन पक्ष (सरकारी वकील) के अनुसार, पीड़िता ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार से ग्रसित है, जिसके कारण वह अपनी सुरक्षा करने या किसी भी अप्रिय घटना का विरोध जताने में पूरी तरह सक्षम नहीं थी। आरोपी पीड़िता के परिवार का बेहद करीबी या परिचित था, जिसके चलते उसे परिवार के भीतर और घर में आसानी से आने-जाने की अनुमति थी।
आरोप है कि इसी करीबी रिश्ते और भरोसे का फायदा उठाकर आरोपी ने युवती की मानसिक कमजोरी और अकेलेपन का फायदा उठाया और उसके साथ इस घिनौने कृत्य को अंजाम दिया। जब पीड़िता के व्यवहार में आए अचानक बदलावों के बाद परिवार को इस शोषण की भनक लगी, तो उन्होंने पुलिस में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज कराई।
क्यों कोर्ट ने जमानत देने से किया साफ इनकार?
अदालत में बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी थी कि आरोपी को जेल में रखने की अब कोई आवश्यकता नहीं है और उसे शर्तों के साथ जमानत दी जानी चाहिए। हालांकि, सेशंस कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्ति समाज के सबसे संवेदनशील और सुरक्षा के पात्र हिस्से होते हैं। ऐसे पीड़ितों के खिलाफ होने वाले अपराध बेहद संगीन श्रेणी में आते हैं।
कोर्ट ने रेखांकित किया कि यदि ऐसे मामलों में आरोपियों को आसानी से जमानत दे दी गई, तो समाज में गलत संदेश जाएगा और पीड़िता व उसके परिवार को डराने-धमकाने या मुख्य गवाहों को प्रभावित किए जाने की पूरी आशंका बनी रहेगी।

