नई दिल्ली: देश की संसद से ऐतिहासिक महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पारित होने के बावजूद चुनावी राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी को लेकर जमीनी हकीकत जस की तस बनी हुई है। चुनाव सुधारों और राजनीतिक शुचिता पर काम करने वाली प्रतिष्ठित संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने अपनी ताजा विश्लेषण रिपोर्ट में एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने में अब भी भारी कंजूसी बरत रहे हैं और साल 2024 के बाद से देश में हुए तमाम प्रमुख चुनावों में कुल उम्मीदवारों में से महज 10 प्रतिशत ही महिलाएं थीं।
आंकड़ों में आधी आबादी की हकीकत: 51,708 में से सिर्फ 5,095 महिलाएं
एडीआर (ADR) ने महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद देश में हुए लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के 51,708 उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों का विधिक व सांख्यिकीय अध्ययन किया है:
- कुल महिला उम्मीदवार: इस विशाल संख्या में से केवल 5,095 महिला प्रत्याशी ही चुनावी मैदान में उतारी गईं, जो कुल उम्मीदवारों का महज 10 प्रतिशत बैठता है।
- 152 सीटों पर सन्नाटा: साल 2024 के आम लोकसभा चुनाव में कुल 8,360 उम्मीदवारों में से सिर्फ 800 महिलाएं थीं। देश के कुल 543 संसदीय क्षेत्रों में से 152 सीटें ऐसी थीं, जहां किसी भी राजनीतिक दल ने एक भी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा।
- सदन में प्रतिनिधित्व: यही कारण है कि वर्तमान 18वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या महज 74 है, जो पूरे सदन का सिर्फ 14 प्रतिशत है।
टिकट वितरण में राष्ट्रीय दलों का असली चेहरा
महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रमुख राजनीतिक दलों का वास्तविक रिपोर्ट कार्ड इस प्रकार रहा है:
राजनीतिक दल महिला उम्मीदवारों को दिए गए टिकट (प्रतिशत) भारतीय जनता पार्टी (BJP) 16% (सबसे ज्यादा) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) 13% मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) 13% बहुजन समाज पार्टी (BSP) 8% आम आदमी पार्टी (AAP) 0% (विश्लेषण के दायरे में आए 22 उम्मीदवारों में से)
राज्यों के विधानसभा चुनावों का भी यही हाल; ओडिशा और दिल्ली आगे
बिल पास होने के बाद देश के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव संपन्न कराए गए हैं। इन चुनावों में उतरे कुल 31,429 उम्मीदवारों में से सिर्फ 3,273 महिलाएं थीं, जो लगभग 10.2 प्रतिशत का आंकड़ा बनाती हैं। किसी भी राज्य में महिला प्रत्याशियों का ग्राफ 14 प्रतिशत की विधिक सीमा को पार नहीं कर सका।
- वर्ष 2024 में ओडिशा इस सूची में सबसे आगे रहा, जहां 13.9 प्रतिशत महिला उम्मीदवार थीं।
- वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली 13.7 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा।
- वर्ष 2026 के हालिया चुनाव में पुडुचेरी में 13.6 प्रतिशत महिला प्रत्याशी मैदान में देखी गईं।
वैश्विक स्तर पर 151वें स्थान पर खिसका भारत; 2029 से पहले उम्मीद नहीं
भारत में कुल महिला मतदाताओं की संख्या लगभग 66.29 करोड़ (आबादी का करीब 49 प्रतिशत) होने के बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में देश वैश्विक स्तर पर काफी पीछे है। 1 मार्च 2025 की आईपीयू (IPU) रैंकिंग के अनुसार, संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत दुनिया के 185 देशों की सूची में निचले पायदान पर यानी 151वें स्थान पर खड़ा है।
कानून लागू होने में विधिक अड़चन:
यद्यपि संसद ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को सर्वसम्मति से पारित कर दिया है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जानी हैं, लेकिन इसे जमीन पर उतरने में अभी वक्त लगेगा। यह कानून देश में अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले सीटों के परिसीमन (Delimitation) के बाद ही विधिक रूप से प्रभावी होगा। रिपोर्ट के अनुसार, इसके लिए साल 2026-27 में प्रस्तावित जनगणना का समय पर पूरा होना अनिवार्य है, ताकि साल 2029 के अगले लोकसभा चुनाव में महिलाओं को उनका वास्तविक विधिक अधिकार मिल सके।

