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Tuesday, June 23, 2026

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केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महिलाओं-ट्रांसजेंडर के लिए मुफ्त बस यात्रा वाली ‘प्रियदर्शिनी योजना’ के खिलाफ PIL खारिज; कहा— “कल्याणकारी योजनाएं राज्य का विधिक दायित्व”

कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) ने राज्य सरकार की बेहद लोकप्रिय और महत्वाकांक्षी ‘प्रियदर्शिनी योजना’ (Priyadarshini Scheme) को विधिक चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को सोमवार (22 जून 2026) को पूरी तरह से खारिज कर दिया। इस जनकल्याणकारी योजना के तहत महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) की साधारण (Ordinary) बसों में मुफ्त यात्रा की विधिक सुविधा दी जाती है।

मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से सरकार का नीतिगत फैसला (Policy Decision) है, जिसका उद्देश्य कामकाजी, आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद महिलाओं को सशक्त बनाना है। अतः इसमें न्यायपालिका के हस्तक्षेप का कोई विधिक आधार नहीं बनता।

याचिकाकर्ता का तर्क: अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन

यह याचिका मोहम्मद फिरदौज नामक व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने खुद को एक जागरूक नागरिक और करदाता (Taxpayer) बताते हुए योजना के विधिक ढांचे पर निम्नलिखित सवाल उठाए थे:

  • समानता के अधिकार का हनन: याचिकाकर्ता का दावा था कि यह योजना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) का उल्लंघन करती है, क्योंकि इसमें बिना किसी आय सीमा (Income Limit) या निवास की शर्त के केवल लिंग के आधार पर मुफ्त यात्रा का लाभ दिया जा रहा है।
  • वित्तीय बोझ का गणित: याचिका में आरोप लगाया गया था कि इस मुफ्त योजना से घाटे में चल रहे सरकारी खजाने पर प्रतिदिन लगभग $2$ करोड़ रुपये और सालाना करीब $800$ करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।

हाईकोर्ट की कड़ी विधिक टिप्पणी: “खर्च होने से योजना असंवैधानिक नहीं होती”केरल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के सभी तर्कों को विधिक रूप से खारिज करते हुए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों और संवैधानिक दायित्वों को रेखांकित किया:“समाज के जरूरतमंद, वंचित और पिछड़े वर्गों को विशेष विधिक लाभ, रियायतें और वित्तीय सुविधाएं देना एक लोक-कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का प्राथमिक दायित्व है। केवल इसलिए कि किसी योजना पर सार्वजनिक धन खर्च होता है या उसमें महिलाओं व ट्रांसजेंडर्स के लिए विशेष प्रावधान (Special Provisions) किए गए हैं, उसे असंवैधानिक या भेदभावपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।”

अदालत ने क्यों तय की अपनी विधिक सीमा?

उच्च न्यायालय ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के विधिक सिद्धांत को दोहराते हुए याचिका को खारिज करने के मुख्य कारण बताए:

  1. वित्तीय समझदारी कोर्ट का काम नहीं: सरकार के नीतिगत फैसलों की आर्थिक व्यवहार्यता (Financial Viability) या उनकी समझदारी का ऑडिट करना न्यायपालिका का काम नहीं है।
  2. असंवैधानिकता का अभाव: जब तक किसी सरकारी आदेश या अधिनियम में स्पष्ट रूप से किसी विधिक या संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन न दिख रहा हो, तब तक अदालतें नीतिगत मामलों में दखल नहीं देतीं। याचिकाकर्ता इस योजना में कोई भी अंतर्निहित असंवैधानिकता (Inherent Unconstitutionality) साबित करने में पूरी तरह विफल रहे।

विभिन्न राज्यों का संदर्भ और राजनीतिक पृष्ठभूमि

विधिक बहस के दौरान राज्य सरकार ने न्यायालय को अवगत कराया कि महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए ऐसी मुफ्त परिवहन योजनाएं देश के कई अन्य राज्यों जैसे दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में पहले से ही विधिक रूप से सफलतापूर्वक संचालित हो रही हैं और इसका पूरा वित्तीय भार राज्य सरकार अपने बजट से वहन कर रही है।

गौरतलब है कि ‘प्रियदर्शिनी योजना’ केरल विधानसभा चुनाव के दौरान यूडीएफ (UDF) गठबंधन द्वारा घोषित किए गए पांच मुख्य चुनावी वादों (Guarantees) में शामिल थी। सत्ता में आने के बाद सरकार ने इसे कैबिनेट की विधिक मंजूरी के साथ लागू किया था। हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब राज्य में इस योजना के निर्बाध संचालन का विधिक रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

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