नई दिल्ली: राष्ट्रपति भवन में गुरुवार (25 जून 2026) को एक विशेष गरिमामयी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मिलिट्री इंजीनियर सर्विसेज (MES) के 2023 और 2024 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों (Probationary Officers) को संबोधित करते हुए देश की संप्रभुता, रणनीतिक स्वायत्तता और पर्यावरण अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण व विधिक संदेश दिया।
राष्ट्रपति ने दोटूक शब्दों में कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ‘आत्मनिर्भरता’ (Self-Reliance) सिर्फ विकास का एक पैमाना या लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) और रणनीतिक मजबूती की विधिक व अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है।
1. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और स्वदेशी सैन्य ताकत का महत्व
राष्ट्रपति मुर्मू ने हालिया सैन्य इतिहास का उल्लेख करते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (Operation Sindhu) का विशेष उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन ने दुनिया के सामने यह विधिक रूप से साफ कर दिया है कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र की सैन्य तैयारी, युद्धक क्षमता और वैश्विक कूटनीतिक प्रभाव को बढ़ाने में स्वदेशी रक्षा प्रणालियों (Indigenous Defense Capabilities) की कितनी निर्णायक भूमिका होती है।
क्या था ‘ऑपरेशन सिंदूर’? (रणनीतिक फ्लैशबैक)
- समय-सीमा: यह ऐतिहासिक और आक्रामक सैन्य अभियान भारतीय सशस्त्र बलों (Armed Forces) द्वारा 7 से 10 मई 2025 के बीच चलाया गया था।
- विधिक कार्रवाई: इस ऑपरेशन के तहत नियंत्रण रेखा (LoC) के पार पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सक्रिय आतंकवादी लॉन्च पैड्स और उनके सैन्य ठिकानों को विधिक रूप से निशाना बनाकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया था।
- बदले की पृष्ठभूमि: यह कड़ी सैन्य कार्रवाई 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पहलगाम (Pahalgam) में हुए एक कायरतापूर्ण आतंकी हमले के विधिक जवाब में की गई थी। उस आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी, जिनमें अधिकांश आम नागरिक और देश-विदेश के पर्यटक शामिल थे।
2. भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक स्थिरता का समीकरण
प्रशिक्षु अधिकारियों को भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से रूबरू कराते हुए राष्ट्रपति ने कहा:
- दूसरों पर निर्भरता कम हो: दुनिया इस समय गंभीर क्षेत्रीय संघर्षों, युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों (Geo-Political Tensions) के दौर से गुजर रही है। ऐसे संकट काल में अंतरराष्ट्रीय पटल पर वही देश विधिक व रणनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में रहता है, जो अपनी सैन्य और लॉजिस्टिक जरूरतों के लिए विदेशी ताकतों पर कम और खुद की क्षमताओं पर ज्यादा निर्भर हो।
- संकट में ढाल है आत्मनिर्भरता: एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बाहरी प्रतिबंधों या वैश्विक आपूर्ति शृंखला (Global Supply Chain) के टूटने की स्थिति में भी अपनी घरेलू आर्थिक स्थिरता (Economic Stability) बनाए रखने में सक्षम होता है।
3. “MES देश के रक्षा ढांचे की रीढ़, ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाना अब विधिक आवश्यकता”
राष्ट्रपति मुर्मू ने मिलिट्री इंजीनियर सर्विसेज (MES) के योगदान की सराहना करते हुए इसे भारतीय रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर की ‘रीढ़’ (Backbone) करार दिया। उन्होंने युवा इंजीनियरों के समक्ष भविष्य की चुनौतियों का खाका रखा:
| रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के मुख्य स्तंभ | राष्ट्रपति द्वारा दिए गए विधिक व व्यावहारिक निर्देश |
|---|---|
| परिचालन क्षमता (Operational Readiness) | MES रणनीतिक और अत्यधिक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य ठिकानों, बंकरों और हवाई पट्टियों का निर्माण व रखरखाव कर सेना की परिचालन क्षमता को विधिक शक्ति प्रदान करता है। |
| सतत विकास (Sustainable Development) | जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को देखते हुए सतत विकास अब कोई विकल्प नहीं बल्कि विधिक अनिवार्यता है। अधिकारियों को अपने निर्माण कार्यों में ग्रीन टेक्नोलॉजी (Green Technology) को प्राथमिकता देनी होगी। |
| संसाधन संरक्षण | सैन्य परिसरों (Military Stations) के निर्माण में ऊर्जा दक्षता, वर्षा जल संचयन (Water Harvesting), हरियाली बढ़ाने और ‘जीरो वेस्ट’ (कचरा प्रबंधन) नीति का कड़ाई से विधिक पालन किया जाना चाहिए। |
विकसित भारत @2047 का लक्ष्य
अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने संगठन के भीतर विविधता और समावेशिता (Diversity & Inclusivity) पर जोर दिया, जो किसी भी कार्यप्रणाली को अधिक नवाचारी (Innovative) बनाती है। उन्होंने पूर्ण विश्वास जताया कि ये युवा सैन्य अधिकारी अपनी विधिक ट्रेनिंग, तकनीकी विशेषज्ञता और राष्ट्र प्रथम की सेवा भावना के बल पर न केवल एक अभेद्य और सुरक्षित भारत का निर्माण करेंगे, बल्कि ‘स्वच्छ, हरित और टिकाऊ भारत’ के सपने को साकार करते हुए वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के विधिक लक्ष्य को हासिल करने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाएंगे।

