नई दिल्ली: देश के ग्रामीण रोजगार परिदृश्य में एक ऐतिहासिक और विधिक रूप से अत्यंत संवेदनशील बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार दो दशक पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA – मनरेगा) को पूरी तरह समाप्त कर आगामी 1 जुलाई 2026 से एक नया विधिक ढांचा ‘विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम’ (VB-GRAM-G) लागू करने जा रही है।
इस नए विधिक कानून को लेकर देश में सियासी पारा पूरी तरह गरमा गया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने मोदी सरकार पर ग्रामीण मजदूरों के विधिक अधिकारों को कमजोर करने और राज्यों पर अनुचित वित्तीय बोझ डालने का गंभीर विधिक व राजनीतिक आरोप लगाया है।
1. बिना संसदीय परामर्श और चर्चा के मनरेगा को खत्म करने का आरोप
कांग्रेस महासचिव और वरिष्ठ विधिक रणनीतिकार जयराम रमेश ने एक आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए:
- हितधारकों की अनदेखी: जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि इतने बड़े विधिक बदलाव को अमलीजामा पहनाने से पहले न तो ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) से कोई व्यापक परामर्श किया गया और न ही राज्य सरकारों व श्रमिक संगठनों को विधिक विश्वास में लिया गया।
- संसदीय बाईपास: उन्होंने कहा कि बिना व्यापक लोकतांत्रिक चर्चा के दो दशक पुराने इस ऐतिहासिक विधिक ढांचे को एक झटके में बदला जा रहा है, जो सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना के विधिक रूप से विपरीत है।
2. वित्तीय दबाव: बीजेपी शासित मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों ने जताई विधिक चिंता
कांग्रेस का दावा है कि नए कानून के वित्तीय नियमों को लेकर कई राज्यों के वित्त और ग्रामीण विकास मंत्रालयों ने केंद्र के समक्ष अपनी विधिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं:
| राज्य का नाम | जताई गई मुख्य विधिक व वित्तीय चिंताएं (Concerns) |
|---|---|
| मध्य प्रदेश (MP) | केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह राज्य ने ही इस योजना के तहत राज्य के वित्तीय हिस्से और अतिरिक्त खर्च को लेकर सवाल उठाए हैं। |
| बिहार और उत्तराखंड | इन राज्यों ने आधिकारिक रूप से चिंता जताई है कि नए विधिक प्रावधानों के कारण राज्य सरकारों के बजट पर अतिरिक्त और अत्यधिक वित्तीय दबाव (Financial Burden) बढ़ेगा। |
| मजदूरी वृद्धि की मांग | कम से कम 5 राज्यों ने नए कानून के तहत ग्रामीण श्रमिकों की न्यूनतम दैनिक मजदूरी को महंगाई दर के सूचकांक के आधार पर तत्काल विधिक रूप से बढ़ाने की मांग की है। |
3. ‘ब्लैकआउट अवधि’ (Blackout Period) का चौतरफा विरोध
जयराम रमेश के अनुसार, कम से कम चार राज्य सरकारों ने नए कानून में प्रस्तावित ‘ब्लैकआउट अवधि’ (Blackout Period) का कड़ा विधिक विरोध किया है।
- क्या है ब्लैकआउट का संकट: नए विधिक नियमों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के चरम सीजन (Peak Agricultural Season) के दौरान इस योजना के तहत सरकारी काम पर रोक (ब्लैकआउट) लगाने का प्रस्ताव है।
- श्रमिकों को नुकसान: कांग्रेस का विधिक तर्क है कि इस प्रावधान से ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन मजदूरों के काम करने और मजदूरी पाने के विधिक अधिकार पर सीधा प्रहार होगा। इससे श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी को लेकर ‘मोलभाव करने की क्षमता’ (Bargaining Power) पूरी तरह कमजोर हो जाएगी।
कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने राज्यों और श्रमिकों की इन विधिक चिंताओं का निवारण किए बिना इसे जबरन 1 जुलाई से लागू किया, तो पार्टी इस प्रशासनिक केंद्रीकरण के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक एक बड़ा विधिक व राजनीतिक आंदोलन शुरू करेगी।

