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Saturday, July 11, 2026

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‘कानून कोई स्क्रिप्ट नहीं जिसे एक्टर की मर्जी से बदला जाए’: चेक बाउंस मामले में अभिनेता राजपाल यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका; सजा बरकरार, सरेंडर करने का विधिक आदेश

नई दिल्ली: अपनी बेहतरीन कॉमेडी से दर्शकों को हंसाने वाले बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव और उनकी पत्नी राधा राजपाल यादव की विधिक मुश्किलें बेहद बढ़ गई हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने आज एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (Murli Projects Pvt. Ltd.) के साथ चल रहे वित्तीय विवाद से जुड़े कई चेक बाउंस मामलों (Check Bounce Cases) में राजपाल यादव और उनकी पत्नी की सजा और दोषसिद्धि (Conviction) को पूरी तरह बरकरार रखा है।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने इस जोड़े द्वारा दायर सभी 21 विधिक याचिकाओं को सिरे से खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और सेशंस कोर्ट के फैसलों में किसी भी प्रकार का विधिक दखल देने से साफ इनकार कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने उन्हें तुरंत जेल अधिकारियों के सामने सरेंडर (Surrender) करने का विधिक आदेश जारी किया है।

1. कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘पैसे देने के बजाय 5 बार जेल जाना पसंद करूँगा’

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राजपाल यादव के टालमटोल वाले रवैये और विधिक प्रक्रिया के प्रति उनके व्यवहार पर बेहद सख्त और तीखी टिप्पणियां कीं:

  • राहत का दुरुपयोग: कोर्ट ने गौर किया कि पूर्व में शिकायतकर्ता के साथ विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने (Settlement) की इच्छा जताने पर अदालत ने मानवीय आधार पर उनकी सजा को सस्पेंड (Suspend) कर दिया था।
  • झूठे आश्वासन: फैसले के विधिक विवरण के अनुसार, राजपाल यादव ने पैसे का इंतजाम करने के लिए बार-बार समय मांगा। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से और अपने सीनियर वकील के जरिए कई बार कोर्ट को यह भरोसा दिलाया कि वह शिकायतकर्ता का पूरा पैसा लौटाने के लिए विधिक रूप से प्रतिबद्ध हैं।
  • बदला रुख: मामला तब निर्णायक और हैरान करने वाले मोड़ पर पहुंचा, जब सुनवाई के अंतिम चरण में राजपाल यादव ने यू-टर्न लेते हुए साफ कह दिया कि वह शिकायतकर्ता को कोई रकम देने को तैयार नहीं हैं और पैसे लौटाने के बजाय पांच बार जेल जाना पसंद करेंगे

2. दिल्ली हाईकोर्ट के कड़े विधिक और दंडात्मक रुख की कड़ियां

राजपाल यादव द्वारा अपनाई गई रणनीतियों और उन पर हाईकोर्ट द्वारा दिए गए विधिक फैसलों का पूरा वर्गीकरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:

राजपाल यादव का रुख / अर्जीदिल्ली हाईकोर्ट का विधिक निर्णय एवं स्टैंड
पैसे के बदले जेल चुनने का बयानकोर्ट का स्टैंड: कानून कोई ऐसी स्क्रिप्ट नहीं है, जिसे किसी एक्टर की मर्जी से दोबारा लिखा जा सके। रणनीति बदलने के साथ विधिक स्थिति को बदला नहीं जा सकता।
प्रोबेशन पर रिहाई की गुहारअर्जी खारिज: कोर्ट ने ‘प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट’ (Probation of Offenders Act) के तहत रिहाई की मांग ठुकरा दी। कोर्ट ने माना कि ऐसा व्यवहार किसी सहानुभूति या विधिक रियायत का हकदार नहीं है।
5 साल की देरी को माफ करने की अपीलअपील खारिज: आपराधिक रिविजन याचिकाएं (Criminal Revision Petitions) दाखिल करने में हुई 5 साल से ज्यादा की देरी को माफ करवाकर सजा को चुनौती देने की उनकी कोशिश को कोर्ट ने विधिक रूप से अमान्य करार दिया।

3. न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सर्वोपरि
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने विधिक आदेश में स्पष्ट रेखांकित किया कि अदालतें पूरी तरह से स्थापित विधिक सिद्धांतों और साक्ष्यों के आधार पर काम करती हैं। देश की न्याय व्यवस्था हर मुकदमेबाज़ से निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति पूर्ण सम्मान की उम्मीद करती है। सालों तक अदालत से बहुत ज्यादा रियायत मिलने के बावजूद याचिकाकर्ता बार-बार अपने विधिक वादे पूरे करने में पूरी तरह नाकाम रहे। इस वजह से कानून के विधिक क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें जेल भेजने का आदेश देना अनिवार्य हो गया था। इस कड़े फैसले के बाद अब राजपाल यादव को विधिक रूप से सलाखों के पीछे जाना ही होगा।

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