किताबों की गुणवत्ता और निष्पक्षता पर अनुभव किए साझा; कहा— गलतियों के सुझावों पर तुरंत होता है सुधार
नई दिल्ली:
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने पाठ्यपुस्तकों के निर्माण, इतिहास के दृष्टिकोण और संस्थागत स्वायत्तता को लेकर अपने अनुभव साझा किए हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में अलग-अलग देश अपने नजरिए से इतिहास का लेखन और अध्ययन करते हैं, जैसे चीन और जापान का एक-दूसरे को लेकर दृष्टिकोण अलग है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि एनसीईआरटी जैसी संस्था को किसी भी राजनीतिक या वैचारिक प्रभाव में आने के बजाय पूरी निष्पक्षता और संस्थागत प्रतिबद्धता के साथ कार्य करना चाहिए।
संस्थागत स्वायत्तता और राजनीतिक दबाव
जेएस राजपूत ने अपने कार्यकाल के दौरान मिले राजनीतिक अनुभवों को साझा करते हुए स्वतंत्र कार्यप्रणाली के महत्व को रेखांकित किया:
मंत्री की सलाह: पदभार संभालते समय एक वरिष्ठ मंत्री ने उन्हें सलाह दी थी कि व्यक्ति आते-जाते रहते हैं लेकिन संस्था हमेशा बनी रहती है। राजनीतिक सिफारिशों को केवल तभी स्वीकार किया जाना चाहिए, जब वे संस्था के हित में हों।
निर्णयों की जिम्मेदारी: सरकार बदलने पर जब नए मंत्री ने उनसे पूछा कि उन्हें काम के निर्देश कौन देता था, तो राजपूत ने स्पष्ट किया कि उन्हें कोई निर्देश नहीं देता था और परिषद द्वारा प्रकाशित हर शब्द की सीधी जिम्मेदारी निदेशक के रूप में उनकी थी।
कैसे तैयार होती हैं एनसीईआरटी की किताबें?
निर्माण के प्रमुख चरण कार्यप्रणाली का विवरण
लेखन आमंत्रण विषयों के अनुसार प्रतिष्ठित लेखकों को आमंत्रित किया जाता है और वे प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार करते हैं।
विशेषज्ञ समीक्षा संबंधित विभागों के प्रोफेसर और बाहरी विषय विशेषज्ञ ड्राफ्ट सामग्री की गहन समीक्षा करते हैं।
विभागीय पड़ताल विभाग प्रमुखों और समीक्षा समितियों द्वारा तथ्यों तथा भाषा की तकनीकी जांच की जाती है।
अंतिम अनुमोदन निदेशक यह सुनिश्चित करते हैं कि संशोधन, संपादन और गुणवत्ता मानकों की सभी प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं।
सुझावों और त्रुटि सुधार की व्यवस्था
राजपूत ने बताया कि पाठ्यपुस्तकों में मानवीय त्रुटियों की पहचान होने पर उन्हें अगले संस्करण में तुरंत दुरुस्त किया जाता है:
किसान की तस्वीर का प्रसंग: कक्षा 3 की एक पुस्तक में हल लिए किसान की तस्वीर के गलत कैप्शन पर एक आम नागरिक की हाथ से लिखी चिट्ठी मिली थी। राजपूत ने पत्र लेखक का आभार जताते हुए उस गलती को तत्काल संशोधित करवाया।
शिक्षकों व छात्रों से संवाद: परिषद निरंतर स्कूलों, छात्रों और अध्यापकों से सुझाव प्राप्त करती है ताकि किताबों की गुणवत्ता को और बेहतर बनाया जा सके।
लेखकों का रुख: उन्होंने यह भी साझा किया कि एक बार इतिहास की किताबों के संशोधन के समय कुछ लेखकों ने राजनीतिक आधार पर काम करने से मना कर दिया था, जिसके बाद अन्य विषय विशेषज्ञों का सहयोग लेकर काम पूरा किया गया।

