दिवंगत लॉ क्लर्क रित्विक देसवाल को समर्पित किया फैसला; पुलिस के सामने कबूलनामा एनएसए का आधार नहीं: कोर्ट
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में नकली एवं मिलावटी दवाओं के अवैध निर्माण और खुली बिक्री पर प्रभावी रोक लगाने के लिए एक समग्र नियामक ढांचा तैयार करने की मांग वाली जनहित याचिका पर महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि इस याचिका की एक प्रति संबंधित प्रशासनिक व नियामक अधिकारियों को उनके आवश्यक विचारार्थ और उपयुक्त कदम उठाने के लिए प्रेषित की जाए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर अर्जी का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। सुनवाई के दौरान जब पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उन्होंने याचिका दाखिल करने से पहले संबंधित सरकारी महकमों को कोई सुझाव या प्रतिवेदन दिया था, तो याचिकाकर्ता ने कानूनी व प्रशासनिक व्यवस्था के खालीपन का हवाला दिया। उन्होंने बंगलूरू के प्रमुख अस्पतालों में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली नकली दवाओं की आपूर्ति से जुड़ी हालिया गंभीर घटनाओं की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले को अदालत में लंबित रखने के बजाय इसे संबंधित अधिकारियों को प्रतिवेदन के तौर पर भेजना अधिक प्रभावी रहेगा, ताकि वे गुण-दोष के आधार पर उचित नीतिगत कदम उठा सकें।
दिवंगत लॉ क्लर्क रित्विक देसवाल को समर्पित किया फैसला
एक अन्य बेहद भावुक और दुर्लभ पहल के तहत, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपना एक न्यायिक फैसला अपने दिवंगत युवा लॉ क्लर्क-कम-रिसर्च एसोसिएट रित्विक देसवाल की स्मृति को समर्पित किया। रित्विक देसवाल का उनके 27वें जन्मदिन से ठीक चार दिन पहले असामयिक निधन हो गया था। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) से जुड़े एक बेहद जटिल कानूनी मामले में शोध और अदालती तैयारी में महत्वपूर्ण सहयोग दिया था।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने देसवाल के आकस्मिक निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि मानव जीवन अत्यंत नाजुक है और उसकी क्षणभंगुरता का अहसास अक्सर बहुत देर से होता है। खंडपीठ ने युवा शोधकर्ता की निष्ठा, कानून के प्रति असाधारण समर्पण और शोध कार्य की मुक्तकंठ से सराहना की।
इसी मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था भी दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारी के समक्ष किसी आरोपी द्वारा दिया गया इकबालिया बयान उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) लागू करने का विधिक आधार नहीं बन सकता। अदालत ने रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के हिरासत में रखना एक असाधारण शक्ति है, जिसका उपयोग प्रशासन को अत्यधिक सावधानी और केवल अपरिहार्य व उचित परिस्थितियों में ही करना चाहिए।

