नई दिल्ली: पवित्र यमुना नदी को नया जीवन देने और उत्तर भारत के छह प्रमुख राज्यों में पानी व बिजली के संकट को हमेशा के लिए समाप्त करने की दिशा में देश ने एक अत्यंत ऐतिहासिक और युगांतरकारी कदम आगे बढ़ाया है। दशकों से राजनीतिक और विधिक गतिरोध में लंबित रही किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना (Kishau Multipurpose Dam Project) को लेकर आखिरकार उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और दिल्ली के बीच पूर्ण आम सहमति बन गई है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक अत्यंत हाई-प्रोफाइल और निर्णायक बैठक में इन सभी छह राज्यों ने इस राष्ट्रीय परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर अपनी अंतिम विधिक सहमति दे दी है। इस ऐतिहासिक समझौते के बाद अब इस महा-परियोजना को अंतिम वित्तीय और प्रशासनिक मंजूरी के लिए सीधे केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की बैठक में जुटे कई राज्यों के मुख्यमंत्री
गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजनरी नेतृत्व में केंद्र सरकार वर्षों से अटकी राष्ट्रीय और जनहित की परियोजनाओं को अंतर-राज्यीय संवाद (Inter-State Dialogue) के जरिए सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस ऐतिहासिक बैठक की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहे। इसके अलावा, केंद्रीय गृह सचिव, जल शक्ति और बिजली मंत्रालयों के सचिव, दोनों राज्यों के मुख्य सचिव तथा प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के शीर्ष नीति-निर्धारक भी इस रणनीति का हिस्सा बने।
लागत का 90% वहन करेगी मोदी सरकार; हिमाचल का पानी दिल्ली-राजस्थान को
इस परियोजना की विधिक और वित्तीय रूपरेखा को बेहद पारदर्शी तरीके से तय किया गया है:
- 90:10 का वित्तीय फॉर्मूला: इस बहुउद्देशीय परियोजना के ‘जल घटक’ (Water Component) की कुल विनिर्माण लागत का 90 प्रतिशत ($90\%$) हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी। वहीं, शेष 10 प्रतिशत ($10\%$) का खर्च संबंधित छह राज्यों के बीच उनके पानी के कोटे के अनुपात में साझा किया जाएगा।
- पानी और बिजली का अनूठा आदान-प्रदान: बैठक में एक बेहद महत्वपूर्ण जल-साझाकरण विधिक सहमति बनी है, जिसके तहत हिमाचल प्रदेश के हिस्से का अधिशेष पानी दिल्ली और राजस्थान को आवंटित किया जाएगा। इसके वित्तीय बदले में, दिल्ली और राजस्थान की सरकारें हिमाचल प्रदेश के बिजली प्रोजेक्ट से जुड़े शुरुआती बुनियादी खर्चों में अपना तय वित्तीय हिस्सा सीधे हिमाचल सरकार को सौंपेंगी।
टोंस नदी पर बनेगा 236 मीटर ऊंचा कंक्रीट बांध; पैदा होगी 600 MW बिजली
किशाऊ बांध परियोजना भौगोलिक और तकनीकी रूप से भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक होने जा रही है:
- लोकेशन: यह महत्वाकांक्षी परियोजना यमुना की सबसे प्रमुख सहायक नदी टोंस (Tons River) पर बनाई जा रही है, जो उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की प्राकृतिक अंतर-राज्यीय सीमा पर स्थित है। भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र उत्तराखंड के डाकपत्थर कस्बे से लगभग 45 किलोमीटर ऊपर की ओर स्थित है।
- बांध की विशालता: इस परियोजना के तहत 236 मीटर ऊंचा एक विशाल कंक्रीट ग्रैविटी बांध (Concrete Dam) बनाया जाएगा।
- बिजली उत्पादन: बांध के पास 150-150 मेगावाट की चार अत्याधुनिक टर्बाइन इकाइयां स्थापित की जाएंगी, जिससे कुल मिलाकर 600 मेगावाट ($600\text{ MW}$) स्वच्छ जलविद्युत (Hydroelectricity) का उत्पादन होगा।
- जल भंडारण क्षमता: इस बांध के पीछे बनने वाले विशाल जलाशय में 1,324 मिलियन घन मीटर पानी के भंडारण की अभूतपूर्व क्षमता विकसित होगी, जो मानसून के बाद सूखे के महीनों में दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों के लिए जीवनदायिनी साबित होगी।
उल्लेखनीय है कि जब वर्ष 1998 में इस दूरगामी परियोजना की प्रारंभिक तकनीकी रूपरेखा तैयार की गई थी, तब इसकी अनुमानित कुल लागत ₹3,566.23 लाख आंकी गई थी, जो वर्तमान समय में संशोधित होकर कई गुना बढ़ चुकी है। गृह मंत्रालय ने विश्वास जताया है कि इस समझौते से यमुना नदी के प्रवाह में प्राकृतिक और स्वच्छ पानी की मात्रा बढ़ेगी, जिससे न केवल नदी का प्रदूषण स्तर न्यूनतम होगा बल्कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पुनः जीवित हो उठेगा।

