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Thursday, June 18, 2026

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‘शिक्षा पर खर्च बढ़ाकर करें GDP का 6 प्रतिशत’: संसद की स्थायी समिति की सरकार से बड़ी सिफारिश; पड़ोसी देशों भूटान-मालदीव से भी पीछे है भारत

नई दिल्ली: देश में उच्च शिक्षा (Higher Education) की गुणवत्ता सुधारने, सभी वर्गों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के दूरगामी लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से हासिल करने के लिए बजट बढ़ाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। संसद की एक शक्तिशाली स्थायी समिति ने अपनी होलिया रिपोर्ट में केंद्र सरकार को कड़े विधिक और वित्तीय सुझाव दिए हैं।

समिति ने साफ शब्दों में रेखांकित किया है कि उच्च शिक्षा के लिए मौजूदा बजट आवंटन वास्तविक आवश्यकताओं की तुलना में बेहद कम है। समिति ने केंद्र सरकार से पुरजोर सिफारिश की है कि देश की पूरी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए शिक्षा पर कुल सार्वजनिक निवेश (Public Investment) को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 6 प्रतिशत ($6\%$) के ऐतिहासिक स्तर पर ले जाने के लिए गंभीर और ठोस प्रयास किए जाएं।

महंगाई के अनुपात में कम से कम 8 से 10% बजट बढ़ना जरूरी था: समिति

राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली ‘शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति’ ने संसद में पेश अपनी विस्तृत रिपोर्ट में उच्च शिक्षा विभाग के बजटीय आवंटन पर गहरी चिंता व्यक्त की है:

  • अपर्याप्त वार्षिक वृद्धि: समिति के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए उच्च शिक्षा विभाग के बजट अनुमान (Budget Estimate) में हुई बढ़ोतरी पिछले वर्षों के रुझानों की तुलना में काफी सुस्त है।
  • महंगाई का असर: समिति का विधिक तर्क है कि देश में बढ़ती वास्तविक महंगाई को देखते हुए उच्च शिक्षा के बजट में हर साल कम से कम 8 से 10 प्रतिशत की अनिवार्य वृद्धि की जानी चाहिए थी। ऐसा न होने से केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के वास्तविक खर्चों और बुनियादी संसाधनों पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

NEP-2020 का लक्ष्य $6\%$, पर भारत अभी $4.12\%$ पर अटका; देखें वैश्विक तुलना
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 स्पष्ट रूप से यह विधिक अधिदेश देती है कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च को जीडीपी के 6 प्रतिशत तक पहुंचाना होगा। हालांकि, समिति ने आधिकारिक सांख्यिकी का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2021-22 में भारत का कुल शिक्षा व्यय जीडीपी का महज 4.12 प्रतिशत ही था, जो कि निर्धारित लक्ष्य से बहुत पीछे है।
यदि हम अपने पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों से भारत के शिक्षा बजट की तुलना करें, तो स्थिति कुछ इस प्रकार दिखाई देती है:

देश / नीति लक्ष्यशिक्षा पर सार्वजनिक खर्च (GDP का प्रतिशत)
भूटान7.47%
मालदीव4.67%
भारत (वास्तविक)4.12%
NEP-2020 निर्धारित लक्ष्य (भारत)6.00%

यह तालिका स्पष्ट करती है कि शिक्षा पर निवेश के मामले में भारत वर्तमान में भूटान और मालदीव जैसे छोटे पड़ोसी देशों से भी पीछे चल रहा है। समिति का मानना है कि यदि भारत को वैश्विक स्तर पर एक ‘ज्ञान महाशक्ति’ (Knowledge Superpower) बनना है, तो इस निवेश अंतर को तुरंत पाटना होगा।

नामांकन अनुपात (GER) में स्थिरता पर चिंता; 2035 का लक्ष्य

समिति ने वर्ष 2018 से 2023 के बीच देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पुरुष और महिला छात्रों के सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrollment Ratio – GER) के आधिकारिक आंकड़ों का भी गहन विश्लेषण किया।

विधिक समीक्षा में पाया गया कि इस पांच वर्षीय अवधि के दौरान देश के कुल नामांकन अनुपात में कोई भी उल्लेखनीय या संतोषजनक वृद्धि दर्ज नहीं की गई है। समिति ने सरकार को सचेत किया कि बेहतर मानव संसाधन विकास और रोजगारोन्मुख (Employment-oriented) शिक्षा के लिए उच्च शिक्षा में अधिक से अधिक युवाओं को जोड़ना अनिवार्य है। इसी के मद्देनजर समिति ने वर्ष 2035 तक एनईपी के लक्ष्यों के अनुरूप निवेश बढ़ाने की समयबद्ध कार्ययोजना बनाने को कहा है।

वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर अतिरिक्त फंड जुटाए शिक्षा मंत्रालय

संसदीय समिति ने शिक्षा मंत्रालय को विशेष निर्देश दिया है कि वह वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) के साथ उच्च स्तरीय विधिक समन्वय स्थापित करे। मंत्रालय संयुक्त रूप से अतिरिक्त बजटीय और गैर-बजटीय धनराशि हासिल करने के विधिक रास्ते तलाशे, ताकि शिक्षा बजट को जीडीपी के 6 प्रतिशत तक पहुंचाया जा सके। इससे प्राथमिक स्कूली शिक्षा से लेकर पीएचडी (PhD) स्तर तक के पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को नया जीवन मिलेगा।

सरकार का आधिकारिक विधिक स्पष्टीकरण

संसदीय समिति की इन गंभीर आपत्तियों और सिफारिशों पर केंद्र सरकार ने भी अपना लिखित पक्ष प्रस्तुत किया है:

वित्तीय अनुशासन: सरकार ने आश्वस्त किया है कि शिक्षा क्षेत्र में सारा खर्च कड़े वित्तीय नियमों के तहत ही किया जा रहा है। साथ ही, सरकार ने समिति की उस विधिक सिफारिश को भी गंभीरता से नोट किया है जिसमें वित्तीय वर्ष के अंतिम महीनों (मार्च रश) में हड़बड़ी में बजट ठिकाने लगाने की प्रवृत्ति से बचने की बात कही गई थी।

बजट की सीमाएं: सरकार ने स्पष्ट किया कि वार्षिक बजट का आवंटन विभिन्न मंत्रालयों की वास्तविक अनिवार्यताओं और वित्त मंत्रालय द्वारा निर्धारित राजकोषीय सीमाओं (Fiscal Limits) के आधार पर संतुलित रूप से किया जाता है।

संशोधित आवंटन: सरकार के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए उच्च शिक्षा विभाग का शुरुआती बजट अनुमान ₹50,077.95 करोड़ निर्धारित किया गया था, जिसे बाद में समीक्षा कर संशोधित अनुमान (Revised Estimate) में बढ़ाकर ₹51,381.67 करोड़ कर दिया गया था।

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