नासिरनगर विध्वंस मामले में राज्य सरकार को दिए निर्देश; पीड़ित 150 बेघर लोगों के पूर्ण पुनर्वास की जिम्मेदारी तय की
अहमदाबाद:
गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को सूरत के नासिरनगर में 30 मई को हुई अवैध तोड़फोड़ (Demolition) की कार्रवाई पर अत्यंत सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि जब तक सूरत नगर निगम (SMC) और पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अपने पदों पर बने रहेंगे, तब तक इस मामले की जांच “महज एक दिखावा” (Eyewash) बनकर रह जाएगी।
न्यायमूर्ति निखिल करियल की पीठ ने नासिरनगर से विस्थापित हुए 26 लोगों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि निष्पक्ष जांच और न्याय सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार को सूरत नगर निगम आयुक्त और पुलिस उपायुक्त (DCP) स्तर के अधिकारियों को जांच पूरी होने तक पदों पर रहने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
बेघर हुए 150 लोगों के पुनर्वास पर सरकार व SMC को घेरा
30 मई को की गई इस गैर-कानूनी कार्रवाई में लगभग 150 लोग बेघर हो गए थे। हाईकोर्ट ने प्रभावितों के पुनर्वास के लिए नगर निगम आयुक्त द्वारा दिए गए प्रस्ताव को खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की:
- NGO के जरिए मदद का प्रस्ताव खारिज: नगर निगम ने ईडब्ल्यूएस (EWS) आवास योजना के तहत एनजीओ की मदद से प्रभावितों को घर देने का प्रस्ताव रखा था, जिसमें ₹20,000 ड्राफ्ट और ₹5.5 लाख निर्माण लागत की शर्त थी।
- निगम की सीधी जिम्मेदारी: हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह तोड़फोड़ पूरी तरह अवैध थी। इसलिए बिना किसी कानूनी आधार के जिनके घर गिराए गए हैं, उनके पूर्ण पुनर्वास की सीधी जिम्मेदारी राज्य सरकार और सूरत नगर निगम की है, जिसे किसी एनजीओ पर नहीं टाला जा सकता।
मामले से जुड़े प्रमुख बिंदु और जांच की स्थिति
| विषय | ब्योरा व अदालती निर्देश |
| जूनियर बनाम सीनियर पर कार्रवाई | सूरत नगर निगम ने 5 कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारियों को निलंबित किया है। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल जूनियरों पर कार्रवाई काफी नहीं, शीर्ष अधिकारियों को भी पद से हटाकर जांच हो। |
| जांच समिति का गठन | राज्य सरकार ने ‘गुजरात नगर निगम अधिनियम, 1949’ के तहत जांच के लिए समिति बनाई है, जो 2 महीने में वरिष्ठ अधिकारियों और निजी लोगों की भूमिका पर रिपोर्ट देगी। |
| मामले की अगली सुनवाई | गुजरात हाईकोर्ट अब इस संवेदनशील मामले पर 14 अगस्त (2026) को अगली सुनवाई करेगा। |

