मुंबई, 29 अप्रैल 2026
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को न्याय प्रणाली के बढ़ते बोझ और व्यक्तिगत ‘अहंकार’ से प्रेरित मुकदमों पर एक बेहद कड़ा और दिलचस्प रुख अपनाया। अदालत ने एक 90 वर्षीय महिला द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे को सीधे 2046 तक के लिए स्थगित कर दिया।
1. मामला क्या है?
यह कानूनी विवाद साल 2017 का है। 90 वर्षीय बुजुर्ग महिला, तारिणिबहन देसाई ने एक अन्य वरिष्ठ नागरिक किल्किलराज भंसाली के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था।
- अदालत का प्रयास: हाई कोर्ट ने कई मौकों पर दोनों पक्षों को सुलह करने और बिना शर्त माफी मांगकर मामला खत्म करने का सुझाव दिया।
- महिला की जिद: सुलह के प्रयासों के बावजूद, याचिकाकर्ता महिला ने मामले की कार्यवाही को आगे बढ़ाने और कानूनी लड़ाई जारी रखने पर जोर दिया।
2. कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘अहंकार की लड़ाई’
न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की पीठ ने इस मामले पर गहरी निराशा जताई। कोर्ट की प्रमुख बातें इस प्रकार रहीं:
- सिस्टम पर बोझ: अदालत ने कहा कि जब पक्षकार अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर ‘अहंकार’ की लड़ाई लड़ते हैं, तो वे न्याय प्रणाली को जाम कर देते हैं।
- प्राथमिकता की अनदेखी: ऐसे मामलों की वजह से अदालतें उन गंभीर मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दे पातीं जिन्हें तत्काल सुनवाई की जरूरत होती है।
- वरिष्ठ नागरिक का दर्जा: अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के ‘अति वरिष्ठ नागरिक’ होने के आधार पर इसे अब कोई प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
3. ऐतिहासिक आदेश: 2046 के बाद होगी सुनवाई
अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए इस मामले को अगले दो दशकों के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया।
“मैं इससे अधिक कुछ नहीं कहना चाहता, सिवाय इसके कि इस मामले को अगले 20 वर्षों तक नहीं सुना जाना चाहिए। यह स्पष्ट किया जाता है कि इस मामले की सुनवाई 2046 से पहले नहीं की जाएगी।” — न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन
निष्कर्ष और संदेश
यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो छोटी-मोटी रंजिशों या व्यक्तिगत अहंकार की संतुष्टि के लिए अदालती समय बर्बाद करते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका का समय उन पीड़ितों के लिए है जिन्हें वाकई कानूनी सुरक्षा और तत्काल राहत की आवश्यकता है।
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