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Wednesday, May 6, 2026

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चेक बाउंस केस: अपील के दौरान 20% राशि जमा करना हर हाल में अनिवार्य नहीं, राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

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जोधपुर। चेक बाउंस (धारा 138, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट) के मामलों में राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और ‘रिपोर्टेबल’ निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सजा के खिलाफ अपील के दौरान जुर्माने की 20% राशि जमा करना कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह शर्त स्वतः (Automatic) लागू नहीं होती, बल्कि इसके लिए परिस्थितियों का आकलन करना आवश्यक है।

फैसला: विवेकाधीन है, अनिवार्य नहीं

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकल पीठ ने कुनाराम बनाम महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड के मामले में यह व्यवस्था दी। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि निचली अदालतों को मैकेनिकल तरीके से 20% राशि जमा करने का आदेश नहीं देना चाहिए। अदालत के अनुसार:

  • धारा 148 (NI Act) के तहत 20% राशि जमा करने का निर्देश तभी दिया जाना चाहिए जब शिकायतकर्ता इसके लिए आवेदन करे।
  • यह प्रावधान विवेकाधीन (Discretionary) है, न कि अनिवार्य (Mandatory)।
  • अपीलीय न्यायालय को सजा स्थगन (Suspension of Sentence) देते समय आरोपी की आर्थिक स्थिति और मामले के तथ्यों पर विचार करना चाहिए।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता कुनाराम (निवासी ओसियां, जोधपुर) को एक ट्रायल कोर्ट ने चेक बाउंस मामले में दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ कुनाराम ने जोधपुर महानगर के अतिरिक्त सत्र न्यायालय में अपील दायर की। सत्र न्यायालय ने सजा तो स्थगित कर दी, लेकिन शर्त रख दी कि कुनाराम को जुर्माने की कुल राशि का 20% हिस्सा पहले जमा करना होगा।

कुनाराम ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति और लीवर-किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों का हवाला देते हुए इस शर्त से छूट मांगी थी, लेकिन सत्र न्यायालय ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिकाकर्ता की दलीलें और सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि:

  1. जंबू भंडारी बनाम मध्य प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (2023) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विशेष परिस्थितियों में 20% जमा की शर्त से छूट दी जा सकती है।
  2. याचिकाकर्ता शारीरिक रूप से चलने-फिरने में असमर्थ है और उसका कोई आय का स्रोत नहीं है।
  3. बिना शिकायतकर्ता के आवेदन के, अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर यह शर्त थोप दी, जो कानूनन गलत है।

BNSS और NI एक्ट का अंतर स्पष्ट किया

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कानून की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 430 (सजा स्थगन का अधिकार) और NI एक्ट की धारा 148 दो अलग-अलग उद्देश्य रखते हैं। अदालत ने माना कि बिना किसी ठोस आधार के आरोपी पर वित्तीय बोझ डालना उसके अपील करने के संवैधानिक अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें 20% राशि जमा करने की शर्त लगाई गई थी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

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