नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़कर एनसीपीआई में शामिल हुए लोकसभा सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की। सूत्रों के अनुसार, इस दौरान संसद के निचले सदन में पार्टी के 20 सांसदों के बैठने की व्यवस्था को लेकर चर्चा हुई।
सूत्रों ने बताया कि सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष से हुई मुलाकात के दौरान नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के नेताओं ने नए संसद भवन में पार्टी कार्यालय आवंटित करने के मुद्दे पर भी बातचीत की। टीएमसी छोड़कर एनसीपीआई में शामिल हुए सांसदों ने ओम बिरला को बताया कि उन्होंने सुदीप बंद्योपाध्याय को अपना सदन नेता, शताब्दी रॉय को उपनेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक नियुक्त किया है।
यह मुलाकात संसद के मानसून सत्र से पहले हुई है। साथ ही यह उस समय हुई है, जब सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में एनसीपीआई को एक घटक दल के रूप में संसदीय मान्यता देने की प्रक्रिया चल रही है।
अमित शाह से भी मुलाकात की?
एक सूत्र ने बताया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की थी। सूत्रों के अनुसार, एनसीपीआई जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को संसदीय मान्यता देने के लिए औपचारिक पत्र सौंप सकती है। पार्टी के नेता 19 जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक में भी शामिल हो सकते हैं।
लोकसभा अध्यक्ष के साथ हुई यह मुलाकात इसलिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि टीएमसी ने पार्टी छोड़कर एनसीपीआई में शामिल हुए 20 सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग करते हुए याचिकाएं दाखिल की हैं।
अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से क्या मांग की?
लोकसभा में टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने ओम बिरला से मुलाकात कर 20 अलग-अलग याचिकाएं सौंपी हैं। इन याचिकाओं में संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत बागी सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग की गई है। अभिषेक बनर्जी ने दलील दी है कि इन सांसदों ने दूसरी पार्टी में शामिल होकर स्वेच्छा से टीएमसी की सदस्यता छोड़ दी है। इसलिए वे अयोग्य घोषित किए जाने के योग्य हैं।
उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से यह भी आग्रह किया है कि खुद को टीएमसी से अलग गुट बताने वाले किसी भी समूह को कोई मान्यता, दर्जा या सुविधा न दी जाए। सूत्रों ने बताया कि सोमवार को सांसदों और लोकसभा अध्यक्ष के बीच हुई बैठक में सदस्यता रद्द करने वाली याचिकाओं का मुद्दा नहीं उठाया गया।

