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महिला आरक्षण पर सियासी घमासान: शशि थरूर ने किरण रिजिजू के दावे को नकारा; कहा- ‘कांग्रेस हमेशा महिला अधिकारों की समर्थक रही’

नई दिल्ली, 28 अप्रैल 2026

केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू और कांग्रेस सांसद शशि थरूर के बीच ‘महिला विरोधी’ टिप्पणी को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है। रिजिजू द्वारा किए गए एक दावे को थरूर ने पूरी तरह खारिज करते हुए कांग्रेस पार्टी के स्टैंड को स्पष्ट किया है।

  1. विवाद की शुरुआत: किरण रिजिजू का दावा
    एक साक्षात्कार के दौरान केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने दावा किया कि संसद सत्र के बाद हुई एक अनौपचारिक बातचीत में शशि थरूर ने कुछ ऐसी बातें कहीं जिससे कांग्रेस की छवि महिला विरोधी झलकती है।

रिजिजू का बयान: उन्होंने कहा कि थरूर ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि कांग्रेस को महिला विरोधी माना जा सकता है, हालांकि व्यक्तिगत रूप से उनकी छवि ऐसी नहीं है।

भाजपा का हमला: भाजपा नेता सीआर केसवन ने इस दावे का समर्थन करते हुए कांग्रेस पर ‘शाह बानो’ मामले और महिला आरक्षण को दशकों तक लटकाए रखने का आरोप लगाया।

  1. शशि थरूर का पलटवार: ‘मेरे पास 7 गवाह हैं’
    शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर एक विस्तृत पोस्ट लिखकर इन दावों का खंडन किया:

दावे को खारिज किया: थरूर ने कहा, “पूरे सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि मैंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा या संकेत नहीं दिया। जिस फोटो (मुलाकात) की बात हो रही है, वहां मौजूद सात गवाह इसकी पुष्टि कर सकते हैं।”

स्पष्टीकरण: उन्होंने आगे कहा कि मंत्री जी अपनी बात का जो भी मतलब निकाल रहे हों, लेकिन मेरा मतलब कभी भी ऐसा नहीं था।

  1. महिला आरक्षण पर कांग्रेस का रुख
    शशि थरूर ने महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराई:

सोनिया गांधी की पहल: थरूर ने याद दिलाया कि कांग्रेस ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में इस विधेयक की पहल की थी और इसे राज्यसभा में पारित कराया था।

तत्काल लागू करने की मांग: उन्होंने कहा कि कांग्रेस महिला आरक्षण को तुरंत (तुरंत) लागू करने के पक्ष में है।

परिसीमन का विरोध: थरूर ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस इस आरक्षण को जनगणना और परिसीमन (Delimitation) की शर्त से जोड़ने के खिलाफ है, क्योंकि इससे इसके लागू होने में कई वर्षों की देरी हो सकती है।

  1. सियासी संदर्भ
    यह विवाद ऐसे समय में आया है जब देशभर में महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बना हुआ है। भाजपा जहां 2023 में पारित हुए महिला आरक्षण कानून को अपनी उपलब्धि बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे ‘चुनावी जुमला’ बताते हुए इसे तुरंत लागू न करने पर सवाल उठा रही है।

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