कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर शुरू हुआ घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। टीएमसी नेतृत्व और बागी विधायकों के बीच जारी वर्चस्व की लड़ाई अब एक नए कानूनी संकट में बदल गई है। पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के कालीघाट (कोलकाता) स्थित आवास पर आयोजित विधायक दल की महत्वपूर्ण बैठकों से जुड़े बेहद गोपनीय और आंतरिक दस्तावेज सोशल मीडिया पर सार्वजनिक (लीक) हो गए हैं। इन वायरल कागजातों में विधायकों की मौजूदगी और उनके हस्ताक्षरों के जरिए सर्वसम्मति का दावा किया गया है, जिस पर बागी गुट के नेता और नवनियुक्त नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी ने फर्जीवाड़े का गंभीर आरोप लगाते हुए उच्च स्तरीय फॉरेंसिक जांच की मांग उठा दी है।
वायरल दस्तावेजों में क्या है? जानिए क्यों खड़ा हुआ नया विवाद
सोशल मीडिया पर लीक हुए आधिकारिक दस्तावेज बीते 6 मई और 19 मई 2026 को कोलकाता के 30बी हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित ममता बनर्जी के पैतृक आवास पर बुलाई गई दो हाई-प्रोफाइल बैठकों से संबंधित बताए जा रहे हैं।
- दस्तावेजों का दावा: कागजातों के अनुसार, 6 मई की बैठक में टीएमसी के 67 विधायक शारीरिक रूप से उपस्थित थे। इन पन्नों पर बकायदा विधायकों के हस्ताक्षर, उनके संबंधित विधानसभा क्षेत्रों के नाम और तारीखें अंकित हैं।
- बैठक का एजेंडा: इस बैठक का मुख्य उद्देश्य टीएमसी विधायक दल के नए नेता (नेता प्रतिपक्ष), उपनेता और मुख्य सचेतक (Chief Whip) का लोकतांत्रिक चुनाव करना था। दस्तावेजों में यह भी नोट लिखा है कि जो विधायक अपरिहार्य कारणों से बैठक में नहीं आ सके, उन्होंने भी नेतृत्व को अपना लिखित समर्थन भेजा था।
‘पन्नों का रंग अलग, गायब हैं दस्तखत’: रितब्रत बनर्जी का फर्जीवाड़े का दावा
इस मामले को लेकर बागी रुख अपना चुके नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी ने इन लीक दस्तावेजों की प्रामाणिकता को सिरे से खारिज कर दिया है। रितब्रत ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा, “इस पूरे मामले में बड़े पैमाने पर जालसाजी और फर्जी हस्ताक्षर (Forgery) का सहारा लिया गया है। जांच एजेंसियों को अब ये नए दस्तावेज भी हाथ लगे हैं। हमारी मांग है कि इन सभी हस्ताक्षरों की जांच तत्काल ‘हैंडराइटिंग एक्सपर्ट’ (हस्तलेखन विशेषज्ञों) से कराई जाए।”
उन्होंने आगे रणनीतिक दलील देते हुए कहा कि यदि निष्पक्ष जांच के लिए उन तारीखों में संबंधित विधायकों के मोबाइल फोन की ‘टावर लोकेशन’ निकाली जाए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि वे वास्तव में कालीघाट में मौजूद थे या नहीं। रितब्रत ने तकनीकी खामियां उजागर करते हुए दावा किया कि वायरल पीडीएफ या फाइलों के अलग-अलग पन्नों का रंग आपस में मेल नहीं खा रहा है और कई महत्वपूर्ण नीतिगत पन्नों पर विधायकों के दस्तखत तक मौजूद नहीं हैं।
ममता बनर्जी बनाम रितब्रत बनर्जी: आमने-सामने आए दो गुट
चुनावी शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस अब स्पष्ट रूप से दो धड़ों में विभाजित नजर आ रही है। एक तरफ ममता बनर्जी का वफादार खेमा है, तो दूसरी तरफ रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट। यह विवाद तब और ज्यादा गहरा गया जब पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) ने ममता खेमे की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए रितब्रत बनर्जी को आधिकारिक तौर पर ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of Opposition) के रूप में मान्यता दे दी। ममता खेमे ने स्पीकर के इस फैसले को पूरी तरह अलोकतांत्रिक बताते हुए इसे कानूनी और राजनीतिक पटल पर चुनौती दी है, जबकि बागी विधायकों का आरोप है कि पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।
हैंडराइटिंग सैंपल ले चुकी है CID; बागी विधायक का बड़ा खुलासा
फर्जी हस्ताक्षर के इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामला राज्य की आपराधिक जांच इकाई यानी सीआईडी (CID) को सौंप दिया गया है। सीआईडी की विशेष टीम मामले की जांच के सिलसिले में अब तक कई टीएमसी विधायकों के आधिकारिक हैंडराइटिंग सैंपल (लिखावट के नमूने) ले चुकी है।
इसी बीच, नाम न छापने की शर्त पर एक बागी विधायक ने अंदरूनी प्रक्रिया का पर्दाफाश करते हुए बड़ा खुलासा किया। उन्होंने बताया कि 19 मई की बैठक के दौरान चालाकी से दो अलग-अलग कोरे कागजों पर विधायकों के हस्ताक्षर कराए गए थे—एक कागज केवल सामान्य उपस्थिति (Attendance) के लिए था, जबकि दूसरे कागज का इस्तेमाल बाद में नेता प्रतिपक्ष के मनोनयन के समर्थन के रूप में कर लिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जांच एजेंसियों की मुस्तैदी और कोर्ट-कचहरी के चक्करों के बीच आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति को पूरी तरह गरमाए रखेगा।

