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Saturday, June 27, 2026

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₹500 की घड़ी का विवाद और व्यक्ति की मौत: 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला; जीवित बचे बुजुर्ग आरोपी की सजा पहले काटी गई अवधि तक सीमित

नई दिल्ली: साल 1997 में महज ₹500 की एक घड़ी के लेनदेन को लेकर दो पड़ोसियों के बीच शुरू हुआ एक मामूली विवाद आखिरकार एक व्यक्ति की असमय मौत का कारण बन गया। इस संवेदनशील आपराधिक मामले में करीब तीन दशक (29 साल) बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने अपना अंतिम विधिक फैसला सुनाते हुए लंबे समय से चली आ रही कानूनी कार्यवाही को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है।

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की खंडपीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषी ठहराए गए तीन लोगों के मामले का निपटारा किया। अदालत ने साफ किया कि आरोपियों की दोषसिद्धि (Conviction) विधिक रूप से बरकरार रहेगी, लेकिन अब जीवित बचे एकमात्र बुजुर्ग आरोपी को उतनी ही सजा मान ली जाएगी, जितनी वह पहले ही जेल में काट चुका है।

क्या था पूरा मामला और कैसे हुई मौत? (तथ्यात्मक पृष्ठभूमि)

यह पूरा मामला देहरादून (उत्तराखंड) के एक ग्रामीण इलाके का है:

  • विवाद की शुरुआत: साल 1997 में पदम सिंह नामक व्यक्ति ने अपने पड़ोसी महुआ को ₹500 में एक हाथ की घड़ी बेची थी। महुआ को वह घड़ी पसंद नहीं आई, जिसके कारण वह उसे वापस करने और पैसे लेने पदम सिंह के पास पहुंचा।
  • हाथापाई और हमला: इसी लेनदेन पर दोनों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई, जो देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गई। इस दौरान महुआ की मदद के लिए रामू और मथु नाम के दो अन्य लोग भी वहां आ गए। तीनों ने मिलकर पदम सिंह पर सामूहिक हमला कर दिया।
  • नहर में धक्का: झगड़े के दौरान तीनों ने पदम सिंह को पास ही स्थित एक सूखी नहर में नीचे धक्का दे दिया। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मथु ने पदम सिंह के सिर पर भारी पत्थर से भी वार किया था। सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें आने के कारण वे नहर की पथरीली सतह पर बेसुध गिर गए। उन्हें तत्काल दून अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का विधिक सफर

न्यायिक मंच (Court)वर्ष (Year)सुनाया गया विधिक फैसला / आदेश
देहरादून ट्रायल कोर्ट2002तीनों आरोपियों (महुआ, रामू और मथु) को धारा 304 के तहत दोषी मानते हुए 5-5 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई।
उत्तराखंड हाई कोर्ट2012निचली अदालत के फैसले को विधिक रूप से सही ठहराते हुए आरोपियों की अपील खारिज की।
सुप्रीम कोर्ट (अंतिम)2026दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन समय और परिस्थितियों को देखते हुए सजा की अवधि में विधिक संशोधन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों घटाई सजा? अदालत का विधिक तर्क
अपील पर अंतिम सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कई महत्वपूर्ण मानवीय और विधिक तथ्य सामने आए:

  1. दो आरोपियों की मृत्यु: सर्वोच्च अदालत में अपील लंबित रहने के दौरान ही तीन मुख्य दोषियों में से दो (महुआ और रामू) की प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो चुकी है।
  2. आरोपी की उम्र और काटी गई सजा: अब जीवित बचे तीसरे आरोपी ‘मथु’ की उम्र 60 वर्ष से अधिक (वरिष्ठ नागरिक) हो चुकी है। विधिक रिकॉर्ड के अनुसार, वह इस मामले में पहले ही लगभग डेढ़ साल (18 महीने) जेल की सलाखों के पीछे बिता चुका है।
  3. चोटों की प्रकृति: बेंच ने मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए नोट किया कि मृतक के चेहरे और सिर पर लगी कुछ चोटें सूखी नहर की पथरीली और नुकीली सतह पर गिरने के कारण भी लगी थीं।

न्यायालय की अंतिम टिप्पणी

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि घटना को घटित हुए लगभग 29 वर्ष का लंबा समय बीत चुका है। इतने लंबे अंतराल और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अब बुजुर्ग हो चुके आरोपी से शेष 5 साल की सजा पूरी करवाना न्याय के सिद्धांत के अनुकूल और उचित नहीं होगा।

अतः अदालत ने मथु की जेल अवधि को उसके द्वारा पूर्व में काटी गई सजा तक ही सीमित (Sentence reduced to period already undergone) करते हुए उसे विधिक राहत दे दी। इस प्रकार, ₹500 की घड़ी से उपजा यह तीन दशक पुराना विवाद कानूनी रूप से शांत हो गया।

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