नई दिल्ली: यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी है कि यदि कोई नाबालिग पीड़ित अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी किसी भी बालिग व्यक्ति (शिक्षक, रिश्तेदार, पड़ोसी या अभिभावक) को देता है, तो उसे अपराध की पुख्ता और पर्याप्त जानकारी माना जाएगा।
अदालत ने साफ किया कि ऐसी स्थिति में उस बालिग व्यक्ति के लिए पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचना देना कानूनी रूप से अनिवार्य (Mandatory) होगा। ऐसा न करने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धाराओं के तहत विधिक कार्रवाई की जाएगी।
1. ‘जानकारी’ का मतलब केवल चश्मदीद होना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने पॉक्सो एक्ट की धारा 19(1) की व्याख्या करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक टिप्पणियां कीं:
- प्रत्यक्षदर्शी होना जरूरी नहीं: अदालत ने कहा कि कानून में ‘अपराध की जानकारी’ होने का मतलब यह कतई नहीं है कि बालिग व्यक्ति ने उस घटना को अपनी आंखों से देखा हो।
- बच्चे का बयान ही पर्याप्त: यदि कोई मासूम बच्चा सहमकर या रोते हुए किसी शिक्षक या रिश्तेदार को अपने साथ हुई दरिंदगी बताता है, तो कानूनन वही सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने का विधिक आधार बनेगी।
2. अरुणाचल प्रदेश स्कूल केस: हाईकोर्ट और निचली अदालत का फैसला पलटा
इस मामले की विधिक पृष्ठभूमि और सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज की गई दलीलों का विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:
| कोर्ट / पक्ष | दी गई दलीलें और पूर्व के फैसले | सुप्रीम कोर्ट का अंतिम विधिक रुख |
|---|---|---|
| ट्रायल कोर्ट और गुवाहाटी हाईकोर्ट | स्कूल की हेडमिस्ट्रेस और शिक्षकों को बरी कर दिया था। तर्क था कि 8 साल की पीड़ित बच्ची के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं थी, इसलिए शिक्षकों के पास घटना पर विश्वास करने का ‘पर्याप्त विधिक आधार’ नहीं था। | फैसला खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह अमान्य और संवेदनशील कानून की भावना के विपरीत करार दिया। |
| चिकित्सकीय साक्ष्य (Medical Report) | मेडिकल जांच में बच्ची के शरीर पर कोई बाहरी चोट के निशान नहीं पाए गए थे। | अदालत का स्टैंड: यौन अपराध के हर मामले में शरीर पर शारीरिक चोट होना अनिवार्य नहीं है। चोट न होने का मतलब यह नहीं कि बच्चे की शिकायत को दबा दिया जाए। |
3. बच्चों के मनोविज्ञान पर पीठ का संवेदनशील दृष्टिकोण
अदालत ने बच्चों की मानसिक स्थिति को रेखांकित करते हुए समाज और संस्थाओं के लिए आवश्यक विधिक दिशा-निर्देश जारी किए:
नाबालिग पीड़ितों के प्रति विधिक संवेदनशीलता⎩⎨
⎧1. सीमित पूछताछ:2. दबाने की कोशिश न हो:3. शिक्षकों की जिम्मेदारी:छोटे बच्चे अक्सर घटना की विधिक गंभीरता को नहीं समझ पाते, इसलिए उनसे बेहद सीमित और संवेदनशील पूछताछ हो।पूछताछ का उद्देश्य शिकायत को झूठा साबित करना या रफा-दफा करना नहीं, बल्कि सच तक पहुंचना होना चाहिए।शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुखों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति विधिक रूप से अधिक जवाबदेह बनना होगा।
4. लापरवाही बरतने पर जेल का विधिक प्रावधान
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब कोई भी स्कूल प्रशासन या रिश्तेदार ‘साक्ष्य के अभाव’ या ‘बदनामी के डर’ का बहाना बनाकर मामले को छुपा नहीं सकेगा। पॉक्सो एक्ट की धारा 21 के तहत, यदि कोई बालिग व्यक्ति ऐसे किसी अपराध की जानकारी होने के बावजूद उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराता है, तो उसे विधिक रूप से कारावास (जेल) और जुर्माने की सजा भुगतनी होगी। सर्वोच्च अदालत का यह रुख देश भर के स्कूलों और बाल गृहों में बच्चों की सुरक्षा को विधिक रूप से मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।

