पणजी/नई दिल्ली: देश में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) को लेकर जारी विधिक व राजनीतिक विमर्श के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के अध्यक्ष पी पी चौधरी ने शनिवार (11 जुलाई 2026) को एक बड़ा और आधिकारिक बयान जारी किया है। उन्होंने बताया कि देश के छह पूर्व मुख्य न्यायाधीशों (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के तीन पूर्व न्यायाधीशों ने समिति को अपनी विधिक राय सौंप दी है।
सांविधानिक विशेषज्ञों और न्यायविदों का स्पष्ट मानना है कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव पूरी तरह से भारतीय संविधान के अनुकूल है। इससे देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) या लोकतांत्रिक मूल्यों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। जेपीसी के दो दिवसीय गोवा (Goa) दौरे के समापन के बाद आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पी पी चौधरी ने इन रणनीतिक और विधिक तथ्यों का खुलासा किया।
1. विशेषज्ञों की विधिक राय: सांविधानिक वैधता पर लगी मुहर
समिति के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि ‘एक साथ चुनाव’ के मार्ग में आने वाली विधिक अड़चनों की गहराई से समीक्षा की गई है:
- संसदीय समिति का पहला सवाल: जेपीसी के सामने प्राथमिक विधिक यक्ष प्रश्न यही था कि क्या एक साथ चुनाव कराना संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) या लोकतंत्र के खिलाफ है?
- न्यायविदों की स्वतंत्र राय: छह पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और विधि आयोग (Law Commission) के अध्यक्ष ने स्वतंत्र रूप से यह विधिक राय दी कि यह व्यवस्था पूरी तरह संविधान सम्मत है।
- आर्थिक विश्लेषण: समिति ने केवल विधिक ही नहीं, बल्कि इसके व्यापक आर्थिक प्रभाव को समझने के लिए देश के शीर्ष अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों से भी गहन विमर्श किया है।
2. अर्थव्यवस्था को मिलेगा ₹7 लाख करोड़ का विधिक व वित्तीय बूस्ट
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पी पी चौधरी ने बार-बार होने वाले चुनावों के दुष्परिणामों और एक साथ चुनाव के फायदों का तकनीकी विश्लेषण प्रस्तुत किया:
’एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का देशव्यापी प्रभाव 1. वित्तीय लाभ:2. नीतिगत निरंतरता:3. प्रशासनिक सुधार:एक साथ चुनाव कराने से देश की अर्थव्यवस्था में करीब 7 लाख करोड़ रुपये जुड़ सकते हैं। बार-बार आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लागू होने से विकास कार्य बाधित नहीं होंगे।सरकारों को बार-बार चुनावी मोड में रहने के बजाय 5 साल का निर्बाध समय मिलेगा।
3. ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के इतिहास और वर्तमान प्रस्ताव के 7 मुख्य बिंदु
जेपीसी द्वारा देशव्यापी मंथन और ऐतिहासिक मिसालों के आधार पर तैयार किए गए सात मुख्य विधिक व प्रशासनिक बिंदु इस प्रकार हैं:
| क्र.सं. | रणनीतिक एवं ऐतिहासिक आयाम | जेपीसी द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक तथ्य व विवरण |
|---|---|---|
| 1 | ऐतिहासिक मिसाल | भारत में वर्ष 1952 से 1967 के बीच लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही आयोजित होते थे। |
| 2 | चक्र टूटने का कारण | विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने, आपातकाल और अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के कारण यह विधिक चक्र टूट गया। |
| 3 | दिग्गजों का विधिक समर्थन | देश के 6 पूर्व मुख्य न्यायाधीश और 3 सुप्रीम कोर्ट जज इस व्यवस्था के पूर्ण समर्थन में हैं। |
| 4 | आर्थिक नुकसान से राहत | बार-बार चुनाव से शिक्षा (शिक्षकों की चुनावी ड्यूटी), पर्यटन (गोवा जैसे राज्यों को नुकसान) और औद्योगिक उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है। |
| 5 | श्रमिक और बैंकिंग क्षेत्र | चुनाव के दौरान 5 करोड़ प्रवासी मजदूर आवाजाही करते हैं, जिससे उद्योगों में उत्पादन गिरता है और बैंकों पर वित्तीय तनाव बढ़ता है। |
| 6 | देशव्यापी मंथन व दौरा | जेपीसी ने अब तक महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, कर्नाटक, गुजरात और गोवा का विधिक दौरा पूरा कर लिया है। |
| 7 | व्यापक हितधारक संवाद | समिति ने मुख्यमंत्रियों, विधानसभा अध्यक्षों, विधायकों, प्रशासनिक अधिकारियों, नागरिक समाज (Civil Society) और मीडिया से सीधे सुझाव लिए हैं। |
4. दशकों के राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर बनेगा कानून
जेपीसी के अध्यक्ष पी पी चौधरी ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने भी अपनी 1983 की वार्षिक रिपोर्ट में इस विधिक सुधार की पुरजोर सिफारिश की थी। देश भर के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मिले इन मूल्यवान विधिक सुझावों और ड्राफ्ट को अंतिम रिपोर्ट तैयार करते समय पूरी तरजीह दी जाएगी। जेपीसी का अंतिम उद्देश्य एक ऐसा सुदृढ़ और दूरगामी विधिक ढांचा तैयार करना है, जो आने वाले कई दशकों तक देश के राजनीतिक स्थायित्व और आर्थिक सशक्तिकरण के हित में काम करे।

