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Tuesday, October 6, 2026

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अगली महामारी से पहले अलर्ट मोड में भारत: 22 हाई-कंटेनमेंट लैब्स का नेटवर्क तैयार, पशुओं में ही पकड़े जाएंगे घातक वायरस

नेशनल वन हेल्थ मिशन के तहत बीएसएल-3 और बीएसएल-4 प्रयोगशालाओं की स्थापना; इंसानों में संक्रमण फैलने से पहले शुरू होगी रोकथाम

नई दिल्ली: भविष्य में किसी भी नई महामारी या अप्रत्याशित जैविक संकट से निपटने के लिए भारत ने अपनी रणनीतिक और वैज्ञानिक तैयारियों को नए स्तर पर पहुंचा दिया है। अगली वैश्विक महामारी के दस्तक देने का इंतजार करने के बजाय केंद्र सरकार ने संक्रमण के शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचानने के लिए एक व्यापक सुरक्षा तंत्र विकसित किया है। इसके तहत ‘नेशनल वन हेल्थ मिशन’ के अंतर्गत देश भर में 22 अत्याधुनिक बीएसएल-3 (बायोसेफ्टी लेवल-3) और बीएसएल-4 (बायोसेफ्टी लेवल-4) हाई-कंटेनमेंट प्रयोगशालाओं का एक मजबूत राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार किया गया है।

इन हाई-टेक प्रयोगशालाओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां केवल मानव आबादी में फैलने वाले ज्ञात वायरसों की ही जांच नहीं होगी, बल्कि मवेशियों, वन्यजीवों और पक्षियों में पनपने वाले दुर्लभ व असामान्य रोगाणुओं का भी गहन विश्लेषण किया जाएगा। इस पूर्व-तैयारी का मुख्य उद्देश्य किसी भी नए घातक वायरस या संक्रामक बीमारी के इंसानों में व्यापक स्तर पर फैलने से पहले ही उसके जोखिम, व्यवहार और म्यूटेशन को वैज्ञानिक रूप से समझकर तत्काल जवाबी कार्रवाई शुरू करना है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर सामने आने वाले अधिकांश गंभीर और जानलेवा संक्रमण मूल रूप से जूनोटिक यानी पशुओं से इंसानों में फैलने वाले रहे हैं। ऐसे में इंसानी आबादी में बीमारी के विस्फोट से पहले ही मूल स्रोत पर निगरानी रखना आवश्यक हो गया है।

‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण की मूल अवधारणा यह है कि मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को अलग-अलग खानों में रखकर नहीं देखा जा सकता। अक्सर किसी नए और अज्ञात रोगजनक की शुरुआत वन्यजीवों या पालतू पशुओं में मामूली लक्षणों के साथ होती है, जो बाद में उत्परिवर्तित होकर इंसानी आबादी में तबाही मचाने की क्षमता हासिल कर लेते हैं। इसलिए महामारी निगरानी प्रणाली को केवल सामान्य अस्पतालों, ओपीडी और इंसानी मरीजों तक सीमित रखने के बजाय पशुपालन, वन्यजीव और पर्यावरण निगरानी तंत्र से पूरी तरह जोड़ दिया गया है।

इस व्यवस्था के तहत यदि किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में पशुओं के भीतर अचानक किसी अज्ञात या असामान्य बीमारी के मामले बढ़ते हैं और उसी दौरान आसपास के लोगों में भी कुछ मिलते-जुलते लक्षण देखे जाते हैं, तो दोनों घटनाओं को अलग-अलग मानने के बजाय उनके बीच संभावित जूनोटिक लिंक की तत्काल गहन पड़ताल की जाएगी। यहीं पर यह अत्याधुनिक हाई-कंटेनमेंट लैब नेटवर्क अपनी निर्णायक भूमिका निभाएगा। संदिग्ध नमूनों के त्वरित जीनोम अनुक्रमण और परीक्षण से वैज्ञानिक तुरंत यह निष्कर्ष निकाल सकेंगे कि संबंधित बीमारी किस रोगजनक से जुड़ी है और क्या उसमें इंसानों के बीच तेजी से फैलने की जैविक क्षमता है। समय पर मिलने वाली यह पुख्ता वैज्ञानिक जानकारी देश को किसी भी बड़े स्वास्थ्य संकट से सुरक्षित रखने में गेमचेंजर साबित होगी।

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