कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद भी राज्य की सियासत में लगातार उबाल देखा जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत और नए मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी के कार्यभार संभालने के बाद से ही राज्य की प्रशासनिक और राजनैतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस करारी हार के बाद अंदरूनी कलह, आरोप-प्रत्यारोप और बड़े बिखराव के दौर से गुजर रही है। देश के प्रमुख डिजिटल शो ‘खबरों के खिलाड़ी’ में वरिष्ठ पत्रकारों ने बंगाल के इस बदलते परिदृश्य पर गहन चर्चा की।
शुभेंदु अधिकारी का ‘सिस्टम एक्शन’ और घुसपैठियों पर चोट
चर्चा की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह ने कहा कि किसी भी लीडरशिप का विजन और मैसेज पूरी तरह क्लियर होना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि ममता बनर्जी ने कभी संसद में घुसपैठियों के खिलाफ पर्चे फाड़े थे, लेकिन बाद में उनका वह एजेंडा खत्म हो गया। अब शुभेंदु अधिकारी इसी एजेंडे को ‘सिस्टम एक्शन’ के जरिए कड़ाई से लागू कर रहे हैं।
वहीं, अवधेश कुमार ने इस बदलाव को ऐतिहासिक बताते हुए कहा, “मैंने अपने जीवन में सरकार बदलने पर इतना त्वरित और आमूल परिवर्तन कभी नहीं देखा था। हकीमपुर सीमा पर घुसपैठिए खुद कह रहे हैं कि सरकार बदल गई है और वे लाइन लगाकर वापस जा रहे हैं। ट्रक ड्राइवरों का कहना है कि अब उनसे कोई अवैध वसूली नहीं हो रही है। भाजपा के पास अब देश को दिखाने के लिए ‘पश्चिम बंगाल मॉडल’ तैयार हो रहा है।”
ममता बनर्जी का ‘इंडिया गठबंधन’ की ओर झुकाव और राष्ट्रीय राजनीति
वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पंत के अनुसार, 15 साल सत्ता में रहने के बाद किसी भी दल की ऐसी हार पर कार्डर का बिखरना स्वाभाविक है, जैसा कभी सीपीएम के दौर में हुआ था। यही वजह है कि ममता बनर्जी ने तुरंत राष्ट्रीय स्तर पर ‘इंडिया अलायंस’ (India Alliance) का राग अलाप दिया है, ताकि पार्टी का वजूद और एक मजबूत आवाज राष्ट्रीय पटल पर बनी रहे।
इस पर विनोद अग्निहोत्री ने तीखा विश्लेषण करते हुए कहा, “डूबते को तिनके का सहारा होता है। ममता जी अब राष्ट्रीय राजनीति में ‘हाथ जोड़ने वाली मुद्रा’ में आएंगी। अब उन्हें कांग्रेस, सपा और यहाँ तक कि वामपंथियों की भी जरूरत है ताकि दिल्ली में भाजपा के खिलाफ लड़ाई में उन्हें सहयोग मिल सके। टीएमसी में आज भी स्वीकार्यता केवल ममता बनर्जी की है, अभिषेक बनर्जी की नहीं।”
टीएमसी सांसदों में टूट और भविष्य का संकट
पत्रकार मिहिर रंजन ने टीएमसी के भविष्य पर बड़ा दावा करते हुए कहा कि बंगाल की यह राजनीतिक रीत रही है कि जो पार्टी सत्ता से जाती है, वह पूरी तरह चली जाती है। ऐसे में टीएमसी के कई सांसदों के सुर अभी से बदलने लगे हैं। वे अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अगले सात-आठ महीनों में नए ठिकाने तलाश सकते हैं।
विनोद अग्निहोत्री ने भी इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि ममता बनर्जी के सामने इस समय अपने सांसदों को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है। टीएमसी के जो गैर-मुस्लिम सांसद या नेता हैं, उन्हें भाजपा के साथ जाने में कोई वैचारिक दिक्कत नहीं होगी; उन्हें बस तृणमूल की तीन पत्तियां हटाकर कमल का फूल ही थामना है।

