नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (Middle East Crisis) में जारी भीषण भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में भारी उछाल आया है। इसके बावजूद, देश के आम नागरिकों को महंगाई के झटके से बचाने के लिए केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियां रोजाना करीब ₹550 करोड़ का भारी-भरकम नुकसान उठा रही हैं।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सरकार वैश्विक संकट का पूरा आर्थिक बोझ सीधे आम जनता, मध्यवर्गीय परिवारों, किसानों और दोपहिया वाहन चालकों की जेब पर नहीं डालना चाहती। इसी संवेदनशील सोच के कारण वैश्विक स्तर पर हुई मूल्य वृद्धि के अनुपात में घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी (LPG) के दाम नहीं बढ़ाए गए हैं।
क्यों हो रहा है तेल कंपनियों को इतना भारी नुकसान?
- खुदरा बाजार में मूल्य नियंत्रण: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) ने खुद घाटा सहकर खुदरा (Retail) बाजार में कीमतों को स्थिर रखा है।
- लक्षित सब्सिडी/राहत: मंत्रालय ने साफ किया है कि यह विशेष राहत केवल आम उपभोक्ताओं और आम जनता के इस्तेमाल के लिए है। औद्योगिक/कमर्शियल (Bulk Buyers) खरीद के लिए दरें अंतरराष्ट्रीय बाजार के वास्तविक भाव के अनुसार ही तय की जा रही हैं।
- महंगाई पर लगाम: सरकार को आशंका है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों के मुताबिक खुदरा दाम बढ़ा दिए गए, तो देश में माल ढुलाई महंगी हो जाएगी, जिससे चौतरफा महंगाई (Inflation) अनियंत्रित हो सकती है।
राहत योजना का दुरुपयोग: निजी पंपों की बिक्री 38% घटी
मंत्रालय के सामने यह बात आई है कि कुछ औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ता नियमों का उल्लंघन कर कमर्शियल दर पर तेल खरीदने के बजाय आम जनता के लिए बने सस्ते खुदरा पेट्रोल पंपों से भारी मात्रा में ईंधन खरीद रहे हैं।
- निजी कंपनियों को झटका: अंतरराष्ट्रीय दरों पर तेल बेचने के कारण निजी तेल कंपनियों के फ्यूल रेट्स काफी ज्यादा हैं। इसके चलते निजी पंपों पर डीजल की बिक्री में 38 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
- सरकारी पंपों पर बढ़ा दबाव: निजी कंपनियों के ग्राहक और औद्योगिक खरीदार अब सरकारी पेट्रोल पंपों की तरफ रुख कर रहे हैं। वहीं, महंगे रेट के कारण सरकारी कंपनियों के बल्क (Bulk) ग्राहकों की संख्या में भी करीब 29 फीसदी की कमी आई है, क्योंकि वे भी खुदरा में तेल खरीदने की कोशिश कर रहे हैं।
कालाबाजारी रोकने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश
सस्ते खुदरा ईंधन के इस गलत इस्तेमाल और अवैध डायवर्जन को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं:
प्रशासनिक निर्देश:
- सभी राज्य सरकारें तुरंत प्रभाव से विशेष निगरानी दल (Special Task Force) गठित करें।
- यह टीमें पेट्रोल पंपों पर होने वाली कालाबाजारी, अवैध भंडारण (Hoarding) और खुदरा ईंधन के कमर्शियल इस्तेमाल पर पैनी नजर रखें।
- नियम तोड़ने वालों और जमाखोरों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत सीधे जेल भेजने जैसी सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
क्या देश में ईंधन की कमी है? अफवाहों पर मंत्रालय का खंडन
पेट्रोलियम मंत्रालय ने देश में पेट्रोल-डीजल की किल्लत से जुड़ी तमाम अफवाहों को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत की मजबूत रिफाइनिंग क्षमता के आंकड़े जारी करते हुए मंत्रालय ने ऊर्जा सुरक्षा का भरोसा दिया:
| पैरामीटर (ऊर्जा सुरक्षा) | क्षमता / आंकड़े |
| वैश्विक स्तर पर भारत का स्थान | दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनिंग देश |
| सक्रिय रिफाइनरियों की संख्या | 22 रिफाइनरियां देश में कार्यरत |
| कुल रिफाइनिंग क्षमता | 258.1 मिलियन टन सालाना |
| वित्त वर्ष 2025-26 में घरेलू खपत | 243.2 मिलियन टन |
| पेट्रोलियम उत्पादों का कुल निर्यात | 61.5 मिलियन टन |
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी घरेलू जरूरत (खपत) से कहीं अधिक ईंधन रिफाइन करता है और भारी मात्रा में निर्यात भी करता है। इसलिए देश में तेल की कोई कमी नहीं है और नागरिकों को किसी भी तरह की अफवाह पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।
आगे की राह:
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबे समय तक खिंचता है, तो सरकार और सरकारी तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव (Under-recoveries) असहनीय स्तर तक बढ़ सकता है। फिलहाल सरकार कीमतों को थामकर जनता को बड़ी राहत दे रही है, लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की तेजी ऐसे ही बरकरार रही, तो आने वाले समय में घरेलू कीमतों में आंशिक बदलाव करना पड़ सकता है।

