मुंबई/कोल्हापुर: देश में घरेलू रसोई गैस (LPG) सिलेंडर की कीमतों में 29 रुपये की ताजा बढ़ोतरी के बाद देश का राजनीतिक तापमान अचानक बेहद गरमा गया है। आम जनता के बजट पर पड़े इस नए आर्थिक झटके को लेकर विपक्षी दलों ने केंद्र की सत्ताधारी भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने सिलसिलेवार बयान जारी कर सरकार की आर्थिक नीतियों को पूरी तरह जनविरोधी करार दिया है।
सरकार को चुकानी पड़ेगी भारी राजनीतिक कीमत: शरद पवार
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में पत्रकारों से औपचारिक बातचीत करते हुए राकांपा प्रमुख शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा। पवार ने कहा, “प्रधानमंत्री देश के सामने लगातार महंगाई पर नियंत्रण पाने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि देश के आम लोगों को हर कुछ दिनों में महंगाई के नए झटके दिए जा रहे हैं। आज स्थिति यह है कि लगातार हो रही मूल्यवृद्धि के कारण मध्यम वर्गीय और गरीब परिवारों की कमर पूरी तरह टूट चुकी है और रसोई का मासिक बजट पूरी तरह बेपटरी हो गया है।”
दिग्गज नेता ने सरकार को कड़ा राजनीतिक अल्टीमेटम देते हुए कहा कि देश की जनता इस आर्थिक प्रताड़ना को बेहद करीब से देख रही है और आने वाले चुनावों में वर्तमान सरकार को इस बेलगाम महंगाई की बहुत भारी राजनीतिक कीमत (Political Cost) चुकानी पड़ेगी।
यूपीए शासन में सड़क पर उतरने वाले अब चुप क्यों? — विजय वडेट्टीवार
महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष विजय वडेट्टीवार ने भी रसोई गैस की कीमतों को लेकर भाजपा के दोहरे रवैए पर तीखा हमला बोला। उन्होंने भाजपा के पुराने दौर की याद दिलाते हुए कहा, “जब केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए (UPA) की सरकार थी, तब रसोई गैस की मामूली कीमतें बढ़ने पर भी यही भाजपा नेता सिलेंडर लेकर सड़कों पर बैठ जाते थे और उग्र प्रदर्शन करते थे। आज पिछले तीन महीनों के भीतर ही सिलेंडर करीब 90 रुपये महंगा हो चुका है, लेकिन भाजपा के तमाम बड़े नेता और उनके मंत्री पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं।”
वडेट्टीवार ने आंकड़ों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि केवल घरेलू एलपीजी ही नहीं, बल्कि पेट्रोल, डीजल, सीएनजी (CNG) और कमर्शियल गैस सिलेंडरों के दामों में भी लगातार बैक-टू-बैक बढ़ोतरी की गई है, जिसने देश के आम परिवारों पर असहनीय अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार और तेल कंपनियों के घाटे का तर्क
दूसरी तरफ, सरकारी तेल विपणन कंपनियों और सरकारी सूत्रों ने इस मूल्य वृद्धि का पुरजोर बचाव किया है। सरकार का तर्क है कि पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में पिछले कई महीनों से जारी सैन्य और कूटनीतिक तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (Global Energy Supply Chain) बुरी तरह चरमरा गई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की कमी की वजह से इनपुट लागत में भारी उछाल आया है। मार्च में की गई 60 रुपये की बढ़ोतरी के बावजूद तेल कंपनियां घरेलू एलपीजी की हर बिक्री पर प्रति सिलेंडर सैकड़ों रुपये का घाटा (अंडर-रिकवरी) उठा रही थीं, जिसके कारण कीमतों में यह आंशिक संशोधन करना उनकी वित्तीय मजबूरी बन गया था। हालांकि, विपक्ष इस तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं है और उसका साफ कहना है कि सरकार महंगाई को नियंत्रित करने के अपने मूल वादे में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।
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