नई दिल्ली: हमारे आधुनिक समाज में महिलाओं की सुरक्षा और विवाह जैसे पवित्र रिश्ते के खोखलेपन को उजागर करती एक बेहद दर्दनाक और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। ‘शादी बचाने’ या ‘घर बसाए रखने’ के नाम पर बेटियों, बहनों और महिलाओं द्वारा एक के बाद एक अपनी जिंदगी गंवा देने का सिलसिला थम नहीं रहा है। हाल ही के चंद दिनों के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों से आई कई युवतियों की मौत की खबरों ने पूरे समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
दिल्ली के पास नोएडा में दीपिका, भोपाल में त्विषा, कर्नाटक के बेल्लारी में ऐश्वर्या और दिल्ली की वीणा कुमारी की असमय मौत इसके ताजा उदाहरण हैं। इससे कुछ महीने पहले निक्की और लखनऊ की मधु भी इसी सामाजिक क्रूरता का शिकार होकर इस दुनिया से रुखसत हो गईं।
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शादी: एक गैर-बराबरी और असंतुलन का रिश्ता
मौजूदा सामाजिक ताने-बाने में शादी आज भी एक गहरी ग़ैरबराबरी वाला रिश्ता बनी हुई है, जहाँ ‘लड़की वाले’ और ‘लड़का वाले’ के रूप में दो असमान धड़े समाज तय करता है। इस सामाजिक तराजू के दोनों पलड़े कभी बराबर नहीं रहते। अमूमन लड़के वालों का पलड़ा भारी रहता है, और लड़की वाले दहेज (Dowry) देकर इस फासले को पाटने या पलड़े को बराबर लाने की नाकाम कोशिश करते हैं। जब तक यह मानसिक और सामाजिक बराबरी नहीं होती, तब तक ताने, मानसिक उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का एक ऐसा अंतहीन सिलसिला शुरू होता है, जो अंततः महिला की जान जाने के बाद ही थमता है।
सभी मामलों में ससुराल पक्ष पर दहेज हिंसा के आरोप
गंभीर बात यह है कि जान गंवाने वाली ये सभी महिलाएं बेहद युवा थीं और उनकी शादीशुदा जिंदगी को अभी कुछ ही महीने हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स और शुरुआती जांच के अनुसार, इनमें से किसी की भी मौत प्राकृतिक नहीं है, बल्कि पूरी तरह से असामान्य है। इन सभी मामलों में मृतका के पति और ससुराल के अन्य सदस्यों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने और हिंसा करने के गंभीर आरोप लगे हैं, जिसके आधार पर पुलिस ने मुकदमे दर्ज किए हैं।
हत्या या आत्महत्या? मूल जड़ ‘स्त्री होना’
कानूनी और सामाजिक बहसों से परे, सबसे अहम और कड़वी बात यह है कि ये बेटियां अब इस दुनिया में नहीं हैं। विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि उन्होंने अपनी जान खुद दी या उनकी जान ली गई; बल्कि असल मुद्दा यह है कि उनकी इस दर्दनाक मौत की जड़ में सिर्फ और सिर्फ उनका ‘स्त्री होना’ है। समाज से यह तीखा सवाल पूछा जाना लाजमी है कि आखिर दहेज किसके दिमाग की उपज है, किसे किससे चाहिए और इसकी वजह से किसका मानसिक और शारीरिक सुकून हमेशा के लिए छिन जाता है? इस जुर्म के लिए कहीं न कहीं पूरा समाज मुजरिम है।
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