कोलकाता: पश्चिम बंगाल में सड़क किनारे दुकान लगाने वाले फेरीवालों (Hawkers) को हटाए जाने और उनके कथित उत्पीड़न के मुद्दे पर राज्य की सियासत एक बार फिर पूरी तरह गरमा गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस विवाद को लेकर खुद सड़कों पर उतर आई हैं। बुधवार को वे फेरीवालों के समर्थन में आयोजित एक बड़े विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कोलकाता के एस्प्लेनेड स्थित वाई-चैनल (Y-Channel) पहुंचीं।
टीएमसी का विधिक और राजनीतिक आरोप है कि राज्य में गरीब फेरीवालों को बिना किसी ठोस पुनर्वास योजना के जबरन विस्थापित किया जा रहा है और उनका प्रशासनिक उत्पीड़न हो रहा है, जिससे सीधे तौर पर उनकी आजीविका और जीवनयापन का विधिक अधिकार प्रभावित हो रहा है।
हावड़ा स्टेशन से 150 स्टॉल और 200 फेरीवालों को हटाए जाने के बाद भड़का विवाद
इस ताजा विवाद की शुरुआत तब हुई जब एक हालिया प्रशासनिक अभियान के तहत हावड़ा स्टेशन (Howrah Station) और उसके आसपास के बड़े व्यावसायिक क्षेत्र से लगभग 150 स्टॉल और सड़क किनारे की अवैध दुकानें पूरी तरह ध्वस्त कर दी गईं।
- प्रभावित वेंडर: इस कार्रवाई की चपेट में करीब 200 फेरीवाले आए, जो पिछले कई वर्षों से वहां खाद्य पदार्थ, फल, खिलौने और दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुएं बेचकर अपने परिवार का पेट पाल रहे थे।
- भाजपा का पलटवार: इस कार्रवाई पर राजनीति तेज करते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने टीएमसी पर सीधा हमला बोला। भाजपा का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में अपने 15 साल के लंबे शासनकाल के दौरान इन अवैध कब्जाधारियों और वेंडरों को केवल अपने राजनीतिक वोट बैंक के लिए अवैध संरक्षण (Patronage) दिया था, जिसके कारण आज रेलवे और सार्वजनिक संपत्तियों पर आम जनता का चलना दूभर हो गया है।
“वेंडर कोई उपेक्षित वस्तु नहीं, उजाड़ने से पहले वैकल्पिक आवास जरूरी”
तृणमूल कांग्रेस ने गरीब फेरीवालों के रोजगार को छीनने के लिए भाजपा की नीतियों पर तीखा प्रहार किया है। पार्टी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा:
“गरीब परिवारों के घरों को ध्वस्त करने और वेंडर्स को विस्थापित करने से पहले, संबंधित अधिकारियों को प्रत्येक प्रभावित नागरिक के लिए उचित पुनर्वास (Rehabilitation), वैकल्पिक व्यावसायिक स्थान और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना चाहिए। आम लोग कोई उपेक्षित वस्तु नहीं हैं कि उन्हें जब चाहे फेंक दिया जाए। उनका जीवन, आजीविका और भविष्य देश के लिए मायने रखता है।”
‘ऑपरेशन सनशाइन’ से लेकर ममता शासन तक: पुराना है कब्जों को हटाने का इतिहास
विधिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो बंगाल में फेरीवालों को हटाने और सड़कों को अतिक्रमण मुक्त (Encroachment-free) करने का यह अभियान केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा है। समय-समय पर राज्य की विभिन्न सरकारों ने जनहित और शहरी विकास के नाम पर ऐसे कड़े कदम उठाए हैं:
| ऐतिहासिक दौर / सरकार | अभियान का नाम / स्वरूप | मुख्य प्रभाव |
| वाम मोर्चा सरकार (Left Front) | ‘ऑपरेशन सनशाइन’ (Operation Sunshine) | कोलकाता की सड़कों से बड़े पैमाने पर फेरीवालों को विस्थापित किया गया था। |
| ममता बनर्जी सरकार (TMC) | अंतिम कार्यकाल का अभियान | मुख्यमंत्री के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल के आखिरी दौर में स्वयं ममता बनर्जी ने भी सार्वजनिक स्थानों से अतिक्रमण हटाने के एक बड़े प्रशासनिक अभियान को विधिक मंजूरी दी थी। |
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर अब राज्य में शहरी गरीबों के विस्थापन और पुनर्वास को लेकर एक नई विधिक बहस शुरू हो गई है, जो आगामी चुनावों में भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरेगी।

