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Thursday, May 21, 2026

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इस्लामी रीति से शादी करने वाली हिंदू महिला भी गुजारे भत्ते की हकदार: कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मजिस्ट्रेट कोर्ट का आदेश बहाल

कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा है, जिसमें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार एक मुस्लिम व्यक्ति से विवाह करने वाली हिंदू महिला को अंतरिम गुजारा भत्ता (Interim Maintenance) देने का आदेश दिया गया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तब तक गुजारा भत्ता देने के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार है, जब तक कि कोई सक्षम अदालत उस शादी को आधिकारिक तौर पर अमान्य (Void) घोषित न कर दे।

क्या था पूरा मामला और महिला के आरोप?

यह मामला पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान जिले का है, जहां पीड़ित महिला ने अपने पति पर गंभीर आरोप लगाए थे:

  • घरेलू हिंसा और परित्याग: महिला का आरोप था कि उसके पति ने उसके साथ घरेलू हिंसा की और बाद में उसे बेसहारा छोड़ दिया।
  • मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला: महिला ने न्याय के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां कोर्ट ने राहत देते हुए महिला के लिए 5,000 रुपये और उसके नाबालिग बेटे के लिए 4,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम गुजारा भत्ता तय किया।
  • ऊपरी अदालत का मोड़: हालांकि, फरवरी 2024 में एक रिवीजन (ऊपरी) कोर्ट (आसनसोल के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश) ने पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट के इस जनहितैषी आदेश को तकनीकी आधारों पर रद्द कर दिया था, जिसके बाद महिला ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘तकनीकी आधार पर सामाजिक न्याय को नुकसान नहीं पहुंचा सकते’

कलकत्ता हाईकोर्ट की जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए रिवीजन कोर्ट के फैसले को पूरी तरह पलट दिया। कोर्ट ने कहा:

“रिवीजन कोर्ट ने इस मामले में स्थापित कानूनों पर सही तरीके से विचार नहीं किया और अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करने में विफल रहा। केवल तकनीकी आधारों पर गुजारा भत्ते को रोकना सामाजिक न्याय के मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है, विशेषकर उन कानूनों को जो महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं।”

हिंदू-मुस्लिम विवाह ‘अनियमित’ है, अमान्य नहीं: इस्लामी कानून की व्याख्या

जस्टिस चैताली चटर्जी ने फैसले के दौरान इस्लामी विवाह कानून (शरिया) और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की महत्वपूर्ण व्याख्या की:

  1. विवाह की श्रेणियां: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्लामी कानून के अनुसार शादियां तीन प्रकार की होती हैं— वैध (Valid), अनियमित (Irregular) और अमान्य (Void)।
  2. हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष का विवाह: कानूनी रूप से एक हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष के बीच हुआ विवाह ‘अनियमित’ (Fasid) की श्रेणी में आता है, इसे पूरी तरह ‘अमान्य’ या अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
  3. सबूतों की प्रामाणिकता: हाईकोर्ट ने नोट किया कि महिला ने शुरुआती तौर पर अपनी शादी का पंजीकरण प्रमाण पत्र (Marriage Registration Certificate) और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र पेश किया है। पति महज मौखिक रूप से इनकार करके इन सरकारी दस्तावेजों को खारिज नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश:

अदालत ने आसनसोल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट का आदेश फिर से बहाल कर दिया है। अब पति को अपनी पत्नी और बच्चे के लिए तय की गई अंतरिम गुजारा भत्ते की पूरी राशि का नियमित भुगतान करना होगा।

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