मुंबई: फरार हीरा कारोबारी नीरव मोदी से जुड़े एक कथित बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की विशेष अदालत ने गुरुवार (11 जून 2026) को एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है। विशेष अदालत ने इस पूरे आपराधिक मामले की फाइल को आगे की सुनवाई के लिए नियमित मजिस्ट्रेट कोर्ट (Magistrate Court) को सौंपने का आदेश जारी कर दिया है। अदालत का यह रुख सीबीआई की उस दलील के बाद सामने आया है, जिसमें जांच एजेंसी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि गहन पड़ताल के बाद भी पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कोई ठोस कानूनी सबूत या आरोप साबित नहीं किए जा सके।
321.88 करोड़ रुपये के लोन डायवर्जन और नुकसान का मामला
यह विशिष्ट मामला सीबीआई द्वारा नीरव मोदी, उनकी विभिन्न हीरा कंपनियों के निदेशकों और पंजाब नेशनल बैंक के अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ दर्ज किया गया था। इस मामले की मुख्य शिकायत पीएनबी की मुंबई क्षेत्रीय शाखा द्वारा दर्ज कराई गई थी।
शिकायत के विधिक दस्तावेजों के अनुसार, नीरव मोदी की स्वामित्व वाली कंपनियों को बैंक की ओर से जो करोड़ों रुपये का व्यावसायिक कर्ज (लोन) मंजूर किया गया था, उसका नियमों के विरुद्ध जाकर गलत इस्तेमाल (Fund Diversion) किया गया। ऋण की राशि को उसी उद्देश्य में नहीं लगाया गया जिसके लिए वह ली गई थी, जिसके कारण देश के प्रतिष्ठित सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पीएनबी को प्रत्यक्ष रूप से 321.88 करोड़ रुपये का भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा और आपराधिक विश्वासघात की घटना सामने आई।
आंतरिक जांच में खुली थी फर्जी शेल कंपनियों की पोलपंजाब नेशनल बैंक की विस्तृत आंतरिक वित्तीय जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ था कि भगोड़े नीरव मोदी से सीधे तौर पर जुड़ी सहयोगी साझेदार कंपनियों, जैसे— सोलर एक्सपोर्ट्स, स्टेलर डायमंड्स और डायमंड आर यूएस तथा उनकी मुख्य पैरेंट कंपनियों फायरस्टार इंटरनेशनल लिमिटेड और फायरस्टार डायमंड्स इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड के बीच आपस में ही भारी-भरकम राशि के फर्जी और संदिग्ध लेन-देन (Transactions) दिखाए गए थे। इस सर्कुलर ट्रेडिंग का मुख्य उद्देश्य बैंक से लिए गए ऋण को छुपाना था।
भ्रष्टाचार की धाराएं हटीं; अब केवल निजी व्यक्तियों पर चलेगा केस
शुरुआती दौर में केंद्रीय जांच एजेंसी ने सभी आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और धारा 420 (धोखाधड़ी) के साथ-साथ अत्यंत कड़े कानून भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act) की धारा 13(2) के तहत एफआईआर दर्ज की थी।
हालांकि, गुरुवार को अदालत की कार्यवाही के दौरान सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक विक्रम सिंह ने कोर्ट को बताया कि वर्षों तक चली कड़ाई से जांच के बावजूद इस मामले में न तो पीएनबी के बैंक अधिकारियों के खिलाफ और न ही किसी निजी व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत कोई आपत्तिजनक डिजिटल या कागजी सामग्री मिली है। लोक अभियोजक ने कहा कि अब इस केस में अंतिम आरोप पत्र (Charge Sheet) केवल नीरव मोदी और अन्य निजी व्यक्तियों के खिलाफ धोखाधड़ी व साजिश की धाराओं में ही दाखिल किया जाएगा। चूंकि सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार का मामला नहीं बनता, इसलिए यह मामला अब विशेष सीबीआई अदालत के कानूनी अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर है और इसे साधारण मजिस्ट्रेट कोर्ट में स्थानांतरित किया जाना चाहिए। विशेष न्यायाधीश जेपी दारेकर ने जांच एजेंसी की इस याचिका को कानूनन स्वीकार करते हुए केस ट्रांसफर करने की मंजूरी दे दी।
13 हजार करोड़ का पीएनबी महाघोटाला: लंदन की जेल में बंद है नीरव मोदी
गौरतलब है कि फरार हीरा कारोबारी नीरव मोदी और उसके सगे मामा मेहुल चोकसी को भारत के बैंकिंग इतिहास के सबसे बड़े ‘पीएनबी महाघोटाले’ का मुख्य मास्टरमाइंड माना जाता है, जिसकी समानांतर जांच सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ED) दोनों स्वतंत्र रूप से कर रहे हैं।
इन दोनों पर आरोप है कि इन्होंने मुंबई स्थित पीएनबी की ब्रैडी हाउस शाखा के शीर्ष अधिकारियों को भारी रिश्वत देकर फर्जी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (LoUs) और विदेशी साख पत्रों के माध्यम से 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक की विशाल जनधन राशि का गबन किया और देश से फरार हो गए। वर्तमान में मेहुल चोकसी के खिलाफ एंटीगुआ और बेल्जियम की अदालत में प्रत्यर्पण (Extradition) की लंबी कानूनी कार्यवाही चल रही है, जबकि मुख्य आरोपी नीरव मोदी ब्रिटेन के लंदन स्थित जेल में बंद है और भारत सरकार उसे वापस लाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है।

